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सुखदा सदा सरस्वती (वृत्यानुप्रास /छेकानुप्रास)

(यहाँ प्रति दोहे में वृत्यानुप्रास है किन्तु सम्पुर्ण रचना में छेकानुप्रास है  अंतर यह है की वृत्यानुप्रास में एक ही वर्ण की पुनरावृत्ति होती है जबकि छेका में अनेक वर्णों  की )

 

गा-गाकर गौरव गिरा गरिमामय गन्धर्व

गीर्वाण गुरु, गीतिमय , गान-ज्ञान गुण गर्व I

 भक्त भगवती भारती भूरि भावमय भव्य

भावशवलता, भ्रान्तिता भ्रमित भनिति भवितव्य I 

 

वीणापाणि वरानना  वरे विदुष विद्वान

वाणी-वाणी वत्सला  वर्ण-वर्ण वरदान I

 

शुभ्र शारदा शशिप्रभा  शोभित शुभ  शतपर्ण

शरद-शुक्ल शत शर्वरी शुचि शाश्वत शितिवर्ण I

 

स्वर साम्राज्ञी सर्वप्रिय  सतरंगी सब-साज

सुखदा सदा सरस्वती  सम्मुख सुकवि समाज I

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 27, 2015 at 11:43am

आ० अनुपमा जी

अनुग्रहीत हुआ. सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 27, 2015 at 11:42am

आ० मीन जी

आपका आभार .  सादर .

Comment by annapurna bajpai on March 26, 2015 at 10:14pm

बहुत ही सुंदर सृजन , आ0 गोपाल नारायण जी 

Comment by Meena Pathak on March 26, 2015 at 9:05pm

सादर नमन सर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 26, 2015 at 11:02am

आ० हरि प्रकाश जी

अनुग्रहीत  हुआ  .सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 26, 2015 at 11:01am

आदरणीय अनुज भंडारी

शत शत आभार .

Comment by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 9:39am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर,  बहुत ही सुन्दर रचना ,अद्भुत ,हार्दिक बधाई ! सादर 

शारदा शशिप्रभा  शोभित शुभ  शतपर्ण

शरद-शुक्ल शत शर्वरी शुचि शाश्वत शितिवर्ण I


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 25, 2015 at 10:48pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , अनुपम छंद रचना हुई है , पढ़ के मन प्रसन्न हो गया ! आपको बधाइयाँ ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 5:01pm

आ० सौरभ जी

आपका आशीष ही प्रतिफलित है . सादर .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 25, 2015 at 3:00pm

आपने इस प्रस्तुति के दोषपूर्ण चरणों में अपेक्षित सुधार कर मेरे कहे को अनुमोदित किया, आदरणीय गोपाल नारायनजी.

इस हेतु हार्दिक धन्यवाद तथा प्रस्तुति के लए पुनः अंतरतम से असीम शुभकामनाएँ

कृपया ध्यान दे...

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