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1212 1122 1212 112/22

दबी हर आह तेरा इश्क़ भी दबा ही सही
जुदा है तेरा ये अंदाज़ तो जुदा ही सही

मेरी ग़ज़ल में उतर आती है वो आहिस्ता
मेरा हयात से बस इतना वास्ता ही सही

ग़ज़ल में डूब के खुद को भुला दिया हमने
चलो कुछ और नहीं तो यही नशा ही सही

खयाल तेरी तमन्ना का है मेरे दिल में
सो रहनुमाई को अब तेरा मशविरा ही सही

हर एक शय में मुहब्बत के किस्से बिखरे हैं
महल नहीं न सही एक मक़बरा ही सही

मेरा खयाले मसर्रत में दिन ग़ुज़रता है
कुछ और देर यूँ ख्वाबों का सिलसिला ही सही

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by दिनेश कुमार on March 1, 2015 at 7:02pm
क्या बात है भाई शिज्जू शकूर साहब, जब भी लिखते हो, बहुत बढ़िया लिखते हो।बेहतरीन ग़ज़ल हुई है ..वाह वाह वाह।
ग़ज़ल में डूब के खुद को भुला दिया हमने
चलो कुछ और नहीं तो यही नशा ही सही....कुर्बान भाई.
....
Comment by maharshi tripathi on March 1, 2015 at 6:30pm

हर एक शय में मुहब्बत के किस्से बिखरे हैं
महल नहीं न सही एक मक़बरा ही सही,,,,,,,आपकी सोच को ढेरों बधाई आ.शिज्जू शंकर जी |

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