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ऐसे खेलो फाग, राग -रंग मन में जागे.
नफ़रत रंग से यूँ धुल जाए, बस अपनापन लागे.
बस अपनापन लागे,यही होली का रंग है.
इसे खेलने का सबका,पर अपना -अपना ढंग है.
कोई दूर से भर पिचकारी,गोरा अंग भिंगाये.
कोई गोरे गाल पे मल-मल,लाल गुलाल लगाए.
दूर -दूर से देखके जिनको, थक गए थे ये  नैन.
वही खड़ी थी पास हमारे, होली की थी रैन.
होली की थी रैन, फ़ायदा झट से उठाया.
उनके रुखसारों पे, धीरे -धीरे रंग लगाया.
होली देती है करीब, आने का सबको मौक़ा.
पर इसकी मर्यादा रखें,दें न किसी को धोखा.
भंग चढ़ाके डोल रहे थे,मुंशी झमनलाल.
इलू -इलू गा कर के, पत्नी को किया बेहाल.
पत्नी को किया बेहाल, भींगा कर साड़ी-चोली.
याद आ गयी मुंशियाइन को, अपनी पहली होली.
हर होली में याद आता है, गुज़रा हुआ ज़माना.
पहली बार धड़कते दिल से,उनको रंग लगाना.
                                  गीतकार - सतीश मापतपुरी

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Comment by Rash Bihari Ravi on March 25, 2011 at 6:39pm
हर होली में याद आता है, गुज़रा हुआ ज़माना.
पहली बार धड़कते दिल से,उनको रंग लगाना.
khubsurat madmast
Comment by satish mapatpuri on March 25, 2011 at 4:03pm
हौसला अफजाई के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद मधुजी..
Comment by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on March 21, 2011 at 12:31am
हर होली में याद आता है, गुज़रा हुआ ज़माना.
पहली बार धड़कते दिल से,उनको रंग लगाना.
अभिनव अभिव्यक्ति 
Comment by satish mapatpuri on March 19, 2011 at 3:32pm
धन्यवाद अरुणजी, होली आपके और आपके परिवार को रंगीन खुशियाँ दे. 
Comment by Abhinav Arun on March 19, 2011 at 3:24pm
वाह सतीश जी होली का बढ़िया चित्र खींच दिया आपने ..बधाई और रंगोत्सव की शुभकामनाएं |

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