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" बाई , कल से काम पर मत आना "|

" लेकिन मेमसाब , मैंने तो कुछ नहीं किया "|

कहना तो चाहती थी " हाँ , तुमने तो कुछ नहीं किया लेकिन साहब को तो नहीं कह सकती मैं ", लेकिन जुबाँ ने साथ नहीं दिया |

बाई हिकारत से देखती हुई चली गयी , उसके अंदर कुछ दरक सा गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित  

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Comment by विनय कुमार on February 19, 2015 at 8:43pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी..

Comment by विनय कुमार on February 19, 2015 at 8:42pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सोमेश कुमार जी..

Comment by विनय कुमार on February 19, 2015 at 8:42pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी.

Comment by maharshi tripathi on February 19, 2015 at 8:07pm

अच्छी लघुकथा पर आपको बधाई आ.विनय कुमार जी |

Comment by somesh kumar on February 19, 2015 at 7:32pm

एक समाजिक वास्तविकता और बहुत से घरों की विवशता को इंगित करती लक्ष्यभेदी लघुकथा पर बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 7:17pm

बढ़िया ... सफल लघुकथा. गहरा प्रभाव .. हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी 

Comment by विनय कुमार on February 19, 2015 at 6:15pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी..

Comment by विनय कुमार on February 19, 2015 at 6:14pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय परी श्लोक जी..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 19, 2015 at 1:09pm

मार्मिक कथा है i  सुन्दर प्रस्तुति  i

Comment by Pari M Shlok on February 19, 2015 at 11:57am
चंद शब्द में बहुत कुछ कह दिया गहरे भाव ...उम्दा

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