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तेरी बेव़फाई मेरी बेव़फाई

तेरी बेव़फाई मेरी बेव़फाई
कहानी समझ में अभी तक न आई
..........
मेरे इश्क़ में तू उधर ज़ल रहा है 
इधर मैंने ज़ल कर मुहब्बत निभाई
..........
बहाने बनाकर ज़ुदा हो गये हम
यूँ दोनों ने मिलके ही दुनिया हँसाई
..........
तुझे मैंने मारा क़भी खंजरों से 
क़भी सेज काँटों की तूने बिछाई
..........
जलाये जो तूने मेरे प्यार के ख़त
तो तस्वीर तेरी भी मैंने ज़लाई

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित



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Comment by umesh katara on February 11, 2015 at 8:31pm

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभारडॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव ji

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 11, 2015 at 1:29pm

आदरणीय कटारा जी

बेहतरीन रचना i कुछ अशआर बहुत ही अच्छे बन पड़े हैं i  सादर i

Comment by umesh katara on February 10, 2015 at 8:27am

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभारDr Ashutosh Mishra ji

Comment by umesh katara on February 10, 2015 at 8:27am

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभाSamar kabeer ji

Comment by umesh katara on February 10, 2015 at 8:26am

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभारsomesh kumar ji

Comment by somesh kumar on February 9, 2015 at 10:42pm

मेरे इश्क़ में तू उधर ज़ल रहा है 
इधर मैंने ज़ल कर मुहब्बत निभाई
..सुंदर गज़ल भाई ,बधाई 

Comment by Samar kabeer on February 8, 2015 at 10:55pm
जनाब उमेश कटारा जी,आदाब,ग़ज़ल अच्छी है लेकिन आपने जला को "ज़ला" और कभी को "क़भी" और जलाई को "ज़लाई" लिखा है,कृपया इसे दुरुस्त फ़रमा लें,ग़ज़ल और सुन्दर हो जाएगी |
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 8, 2015 at 9:27pm

आदरणीय उमेश जी ..इस नदार रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by umesh katara on February 8, 2015 at 7:59pm

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभारgumnaam pithoragarhi ji

Comment by umesh katara on February 8, 2015 at 7:59pm

आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिये सादर आभारHari Prakash Dubey ji

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