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"सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम्"

अखण्ड आर्यावर्त की, उमंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

बुद्ध-कृष्ण-राम की, पुनीत –भूमि पावनी !

सुहार्द सम्पदा अनन्त, श्ष्यता संवारती !

सतार्थ धर्मं युद्ध में, सशक्त श्याम सारथी !

परार्थ में दधीचि ने, स्वदेह भी बिसार दी !!

 

निनाद कर रही उभंग, बंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

धर्मं-जाति-वेश में, जरूर हम अनेक हैं !

परम्परा अनेक और बोलियाँ अनेक हैं !

अनेकता में एकता की शान एक–एक है !

कुर्बान हिन्द के लिए कि जान एक–एक है !!

 

रहीम और राम  संग-संग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

अच्छे दिन लिए , नया प्रभात आ गया !

नवीनता प्रबुद्ध्ता का, शंखनाद छा गया !

किरण-किरण प्रकाश से,प्रदीप्त भाषमान है !

दिव्यता–भरित धरा, निर्भीक आसमान है !!

 

हस्त में अभय ध्वजा, तरंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

इक्कीसवी सदी सुखद, बसन्त हो गया चमन !

कली-कली पराग से, सनद्ध हो गया पवन !

प्रसून प्रेम से भरा, प्रसन्न हो गया सुमन !

भवरुता-भरित विमल , विश्व भारती भवन !!

मैं डोर हूँ ,अज़ान,तू पतंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on January 22, 2015 at 10:23pm
हा हा हा ! क्या बात है आदरणीय! पर क्या इसका वजन १२१ है?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 9:20pm
हा हा हा ... बहुत खूब हरि भाई जी
Comment by Hari Prakash Dubey on January 22, 2015 at 9:05pm

आदरणीय  राहुल जी , सब कुछ तो आदरणीय मिथिलेश जी ने बता ही दिया ...ब्रह्माण्ड का वज़न आज तक कौन बता पाया है ...हा ...हा ...हा ...आनंद आ गया राहुल जी ...! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 8:55pm

आदरणीय राज बुन्देली जी की रचना(लिंक) पर आदरणीय सौरभ सर की टिप्पणी में भी बड़ी अच्छी बात साझा हुई है उसे लिख रहा हूँ -

इस छंद का संक्षिप्त विधान यों होगा..

रगण जगण रगण जगण रगण + गुरु

यानि, १२१ २१२ १२१ २१२ १२१ +२ ..

एक रोचक तथ्य सभी के साथ साझा करना चाहता हूँ, जो कि आदरणीय भाई राजबुन्देली के साथ कल रात बातचीत के क्रम में उन्हें स्पष्ट कर रहा था.

लघु गुरु (१ २) के आठ जोड़े को पंचचामर छंद कहते हैं.

इसीकी दूनी आवृति हो, यानि, लघु गुरु के सोलह जोड़े,  तो वह आवृति दण्डक होगी और अनंगशेखर छंद कहलाती है. और, यदि इसकी आधी आवृति हो, यानि लघु गुरु के चार जोड़े, तो वह आवृति प्रमाणिका छंद कहलाती है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 8:32pm

आदरणीय राहुल भाई जी आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर की टिप्पणी में छंद और मात्रा विन्यास दोनों का उल्लेख है. गुनीजनों के कमेन्ट अवश्य पढ़े बहुत लाभ होता है, अनुभव की बात कह रहा हूँ.

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 22, 2015 at 7:50pm
आदरणीय दूबे जी अगर आप मुझे इस रचना के छन्द से परिचित करा दे तो बडी मेहरबानी होगी! सादर! हो सके तो क्रपा कर के ब्रह्माण्ड का वज्न भी बताए!
Comment by Hari Prakash Dubey on January 19, 2015 at 7:42pm

सोमेश भाई ये तो आपका स्नेह है , आपका हार्दिक आभार !

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 19, 2015 at 1:23am
सतार्थ धर्मं युद्ध में, सशक्त श्याम सारथी !
परार्थ में दधीचि ने, स्वदेह भी बिसार दी !!
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , बधाई, सादर।
Comment by somesh kumar on January 18, 2015 at 11:53pm

इस रचना के मूल भाव को प्रणाम |और आप के प्रतिदिन निखरते काव्य-स्वरूप पर बधाई |

Comment by Hari Prakash Dubey on January 18, 2015 at 3:04pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर, महत्वपूर्ण जानकारी और उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत आभार ! सादर !

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