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मेरा जीवन पी  गया, तेरी कैसी प्यास ।

पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास ।१।

                 

मन में तम सा छा गया, रात करे फिर शोर।

दिनकर जो अपना नहीं, क्या संध्या क्या भोर ।२।

                 

बैठे बैठे रो रही, बरगद की अब छाँव ।

कौन चुराकर ले गया, पंछी वाला गाँव ।३।

                 

नटखट को फटकारियें, सोचें उसके बाद ।

जायेगी किस पे भला, अपनी है औलाद ।४।

                 

कच्चा मन! कच्ची उमर ! उफ़ टूटे जब ख्वाब ।

बित्ते भर रूमाल में,....... मुट्ठी भर सैलाब ।५।

                 

अपना घर करने लगा, अपना ही अपमान ।

दस्तक सुनकर मौन है,....दीवारों के कान ।६।

                 

एक अकेले प्रश्न पर,  सारी गलियाँ मौन ।

पूछ रहा है वक्त भी,... राह दिखाएँ कौन ।७।

                 

उजड़े से सब खंडहर,....... कहते है इतिहास ।

सोच समझ के कीजिये, अपनों पर विश्वास ।८।

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 11:11am
आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी दोहो पर आपकी टिप्पणी भूलवश डिलीट हो गई। मोबाइल से ऑपरेट करने के कारण ऐसा हुआ। क्षमा चाहता हूँ। आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:20pm

आदरणीया pratibha tripathi जी  इस सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ... बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:18pm

आदरणीय  Dr. Vijai Shanker सर सराहना और उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:16pm

आदरणीय  gumnaam pithoragarhi  सर जी आपकी स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:15pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर  आपकी रचना पर उपस्थिति और सराहना सदैव उत्साह वर्धक होती है. इस स्नेह और आशीष के लिए नमन.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:12pm

आदरणीय श्याम वर्मा जी सराहना और उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए आभार हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 9:11pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ये दोहे आपको पसंद आये, लिखना सार्थक हुआ आपके स्नेह और सराहना के लिए हार्दिक आभार 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 13, 2015 at 7:57pm

बेहतरीन दोहे ...

उजड़े से सब खंडहर,....... कहते है इतिहास ।

सोच समझ के कीजिये, अपनों पर विश्वास ।८।

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 13, 2015 at 6:56pm
कच्चा मन, कच्ची उमर, के जब टूटें ख्वाब ।
बित्ते भर रूमाल में,....... मुट्ठी भर सैलाब ।५।
बहुत खूबसूरत, बधाई.
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 13, 2015 at 6:20pm

               

बैठे बैठे रो रही, बरगद की अब छाँव ।

कौन चुरा के ले गया, पंछी वाला गाँव ।३।

                 वाह खूब बहुत अच्छा वाह .............

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