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212 212 212 2

आके ठहरा सफर मयकदे मेँ ।
अब तो होगी गुज़र मयकदे मेँ ।

उम्र भर की खलिश हम भुलाकर ,
हो गये बेखबर मयकदे मेँ ।

सुर्ख पैमाने छलका रहे हैँ ,
अब तो शामो सहर मयकदे मेँ ।

साकिया तेरा रहमो करम हैँ ,
बस गया मेरा घर मयकदे मेँ ।

मुद्दतोँ बाद हम पे हुयी है ,
वो नशीली नजर मयकदे मेँ ।

सुबह तक ये न उतरेगी मस्ती ,
झूम लो रात भर मयकदे मेँ ।

ऐ खुदा तेरी जन्नत मेँ क्या है ,
देख ले इक नजर मयकदे मेँ ।

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज मिश्रा

Views: 520

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 5, 2015 at 10:40am

आदरणीय नीरज प्रेम भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाई स्वीकार करें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 5, 2015 at 12:20am

भाई नीरजजी, मुझे आपकीप्रस्तुति अच्छी लगी है. हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें
शुभ-शुभ


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 4, 2015 at 4:33pm

वर्तमान में ग़ज़ल खारिज है, मतला दुरुस्त कर / करवा लें. 

Comment by ram shiromani pathak on January 4, 2015 at 3:20pm
वाह वाह ।।भाई पीने के बाद तो नहीं लिखी है।।हार्दिक बधाई
Comment by Neeraj Nishchal on January 4, 2015 at 11:55am
भाई शिज्जू माफ करेँ सफर की जगह सितम लिख गया बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by Neeraj Nishchal on January 4, 2015 at 11:53am
बहुत बहुत शुक्रिया प्रकाश दुबे जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 4, 2015 at 10:19am

भाई नीरज जी मतला सही करलें शेष रचना अच्छी है शुभकामनायें

Comment by Hari Prakash Dubey on January 3, 2015 at 8:21pm

ऐ खुदा तेरी जन्नत मेँ क्या है ,
देख ले इक नजर मयकदे मेँ ।......... सुन्दर रचना  बहुत- बहुत बधाई नीरज मिश्रा जी आपको !

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