For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जो टूटा सो टूट गया
रूठा सो रूठ गया ।
साथ चले जिस पथ पर थे
आखिर तो वो भी छूट गया ।

गाँव की पगडण्डी वो छूटी , पानी पनघट छूट गया
खेतवारी बँसवारी छूटी, बचपन कोई लूट गया
भर अँकवारी रोई दुआरी ,नइहर मोरा छूट गया ।
जो....


अँचरा अम्मा का जो छूटा ,घर आँगन सब छूट गया
छिप - छिप बाबा का रोना भइया वो बिसुरता छूट गया
तीस उठी है करेजे में ज्यूँ पत्थर कोई कूँट गया ।
जो…।


पाही पलानी मौन हुए मड़ई से छप्पर रूठ गया
सोन चिरईया फुर्र हो गयी कोकिल का स्वर रूठ गया
साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।
जो.......

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 704

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Hari Prakash Dubey on January 29, 2015 at 8:10pm

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीया मंजरीजी...

गाँव की पगडण्डी वो छूटी , पानी पनघट छूट गया

खेतवारी बँसवारी छूटी, बचपन कोई लूट गया

भर अँकवारी रोई दुआरी ,नइहर मोरा छूट गया ।..... बहुत बहुत बधाई ! सादर 

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 25, 2015 at 12:29pm
बहुत मीठा सुन्दर गीत वाह!
Comment by Ram Ashery on January 24, 2015 at 9:13pm

आपके गीत मेरे मन को छू  गया ,

बचपन की याद आज ताजी हो गई 

कोई साथी किसी मोड पर मिल गया 

गाँव गली छोड़ मैं शहर में बस गया

माँ बाप भाई बहन सबकी यादें रह गई

क्या करें मजबूर हैं बस अकेला रह गया  

आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2014 at 12:18am

पारम्परिक गीतों में जिस गहराई से बिछोह का दर्द उमड़ा आता है वह विस्मित करता है. आदरणीया मंजरीजी, आपके प्रस्तुत गीत ने ग्रामीण अंचल की मधुरता को साझा किया है, जहाँ भले लोगों की छोटी-छोटी इच्छाओं की तृप्ति से रस पाती भोली-भाली दुनिया बसा करती थी.
हार्दिक बधाइयाँ.

Comment by somesh kumar on December 19, 2014 at 11:45pm

देसज शब्दों के साथ ,छुटने की इस पीड़ा को बड़ी सुन्दरता से शब्द दिए हैं आप ने ,बधाई !

Comment by mrs manjari pandey on December 19, 2014 at 8:08pm
आदरणीय अजय शर्मा जी सारगर्भित टिप्पणी के लिए आभारी हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 19, 2014 at 12:45am

पाही पलानी मौन हुए मड़ई से छप्पर रूठ गया
सोन चिरईया फुर्र हो गयी कोकिल का स्वर रूठ गया
साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।

सुन्दर रचना ... बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by ajay sharma on December 18, 2014 at 11:00pm

साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।,,,,,,,,,,,,,,bahut hi marmik aur pratbinbyukta  , bhav praval rachna ne man moh liya    wah wah wah.. 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
21 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service