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वक़्ते-पैदाइश पे यूं

मेरा कोई मज़हब नहीं था
अगर था मैं,

फ़क़त इंसान था, इक रौशनी था

बनाया मैं गया मज़हब का दीवाना
कि ज़ुल्मत से भरा इंसानियत से हो के बेगाना
मुझे फिर फिर जनाया क्यूँ
कि मुझको क्यूँ बनाया यूं

पहनकर इक जनेऊ मैं बिरहमन हो गया यारो
हुआ खतना, पढ़ा कलमा, मुसलमिन हो गया यारों
कहा सबने कि मज़हब लिक्ख
दिया किरपान बन गया सिक्ख

कि बस ऐसे धरम की खाल को
मज़हब के कच्चे माल को
यूं ठोककर और पीटकर
खूं से सजाने वाला था
फ़ित्ना सिखाने वाला था
इक कारखाना कारगर
यारो कि मेरा अपना घर.…… अपना घर

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(मौलिक व अप्रकाशित) - मिथिलेश वामनकर
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Comment

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Comment by vijay nikore on March 14, 2016 at 12:54pm

//

वक़्ते-पैदाइश पे यूं

मेरा कोई मज़हब नहीं था 
अगर था मैं,

फ़क़त इंसान था, इक रौशनी था//

इस खूबसूरत रचना के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय मिथिलेश जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 18, 2015 at 6:39pm
आत्मीय अनुमोदन हेतु हार्दिक आभार।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 18, 2015 at 3:50pm

बस नमन और क्या ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2015 at 6:48pm

आदरणीया  shalini kaushik  जी रचना की सराहना और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार 

Comment by shalini kaushik on February 1, 2015 at 10:44pm

पहनकर इक जनेऊ मैं बिरहमन हो गया यारो 
हुआ खतना, पढ़ा कलमा, मुसलमिन हो गया यारों 
कहा सबने कि मज़हब लिक्ख 
दिया किरपान बन गया सिक्ख

kitna aasan hai dharm parivartan kash itna asan insan banna hota .nice feelings .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2014 at 10:07pm

आदरणीय नरेन्द्र जी बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2014 at 10:07pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपका बहुत बहुत आभार धन्यवाद .. आपकी हौसलाअफजाई से कुछ और नज्में कह सकूंगा... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2014 at 1:33pm

आ. मिथिलेश भाई , सुरुवाती संस्कार घर मे ही पड़्ते हैं और वही अंततः हमारा व्यवहार तय करता है ! सुन्दर न्ज़्म के लिये बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 4, 2014 at 11:28pm

आदरणीय सोमेश जी सही कहा आपने | आपको प्रस्तुति पसंद आई ..आभार धन्यवाद

Comment by somesh kumar on December 4, 2014 at 11:08pm

तालीम घर से होती है फिर चाहे वो मजहब की हो या उसके मूल्यों की ,परिवेश और घर वालों की सोच से हम अपने अंदर धर्म को ढालते है|सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई |

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