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“मुझे पत्थरों से टकराने दो”

तुम बने रहो अविनाशी
मेरा सर्वनाश हो जाने दो
स्वयं बने रहो अजन्मे
मुझे जनम-जनम भटकाने को
रहो तुम बैठे मंदिरों में
मुझे यायावर बन जाने दो
करवाओ खुद पर फूलों की वर्षा
मुझे पत्थरों से टकराने दो
मुझे पत्थरों से टकराने दो !!
© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 10, 2014 at 1:48pm

परिस्थितिजन्य नैराश्य के चलते ईश्वर के समक्ष व्याकुल मन के भाव प्रस्तुत करने का सुन्दर प्रयास 

हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर 

//स्वयं बने रहो अजन्मे
मुझे जनम-जनम भटकाने को//............ न पंक्तियों में अर्थ के सापेक्ष व्याकरणिक त्रुटी है... 'भटकाने दो' पर पुनः विचार कीजिये 

शुभेच्छाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2014 at 8:41am

आ, हरि भाई , अपने ईश्वर से आपकी मासूम शिकायत के लिये बधाई ।

Comment by Hari Prakash Dubey on November 9, 2014 at 8:40am

Thanks a lot Umesh Katara Sir.

Comment by umesh katara on November 9, 2014 at 8:20am

beutiful waaaaaaah

Comment by Chhaya Shukla on November 8, 2014 at 9:15pm

आ. हरी प्रकाश डूबे जी
अभिवादन
कविता का प्रवाह और प्रभु से शिकायत का अंदाज़ अनुपम अनुभूति कराया बहुत बहुत बधाई लघु कविता के लिए सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on November 8, 2014 at 7:35pm

आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 8, 2014 at 6:42pm

परेशानी में व्यथित मन तकदीर या भगवान् से शिकायत करता है ...बढ़िया लघु कविता ...बधाई आपको 

Comment by Hari Prakash Dubey on November 8, 2014 at 12:03pm
आपका हार्दिक आभार, आदरणीय अरुण जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 7, 2014 at 10:58pm
आदरणीय हरिप्रकाश जी, भावपूर्ण कविया के लिये बधाई.........

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