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दोगलापन (लघु कहानी)

"कुछ पुन्य कर्म भी कर लिया करो भाग्यवान, सोसायटी की सारी औरतें कन्या जिमाती है, और तू है कि कोई धर्म कर्म है ही नहीं|"
"देखिये जी लोग क्या कहते है, करते है इससे हमसे कोई मतलब ......"
बात को बीच में काटते हुए रमेश बोले- "हाँ हाँ मालुम है तू तो दूसरे ही लोक से आई है, पर मेरे कहने पर ही सही कर लिया कर|"
नवमी पर दरवाजे की घंटी बजी- -सामने छोटे बच्चों की भीड़ देख सोचा रख ही लूँ पतिदेव का मन| जैसे ही बिठा प्यार से भोजन परोसने लगी तो चेहरे और शरीर पर नजर गयी किसी की नाक बह रही थी, तो किसी के कपड़ो से गन्दी सी बदबू आ रही थी, मन खट्टा सा हो गया| किसी तरह शिखा ने दक्षिणा दे पा विदा कर अपने हाथ पैर धुले|
"देखो जी कहें देती हूँ इस बार तो आपका मन रख लिया, पर अगली बार भूले से मत कहना........| इतने गंदे बच्चे जानते हो एक तो नाक में ऊँगली डालने के बाद खाना खायी| मुझसे ना होगा यह....ऐसा लग रहा था कन्या नहीं खिला रही बल्कि.....भाव कुछ और हो जाये तो क्या फायदा ऐसी कन्या भोज का| अतः मुझसे उम्मीद मत ही रखना|"
"अच्छा बाबा जो मर्जी आये करो, बस सोचा नास्तिक से तुझे थोड़ा आस्तिक बना दूँ|"
"मैं नास्तिक नहीं हूँ जी. बस यह ढोंग मुझसे नहीं होता समझे आप|"
"अच्छा-अच्छा दूरग्रही प्राणी|"...पूरे घर में खिलखिलाहट गूंज पड़ी
पड़ोसियों ने दूजे दिन कहा -यार तेरी मुराद पूरी हो गयी क्या ? बड़ी हंसी सुनाई दे रही थी बाहर तक| हम इन नीची बस्ती के गंदे बच्चो को कितने सालो से झेल रहे है, पर नवरात्रे में ऐसे ठहाके नहीं गूंजे ..बता क्या बात हुई|"
शिखा मुस्करा पड़ी .....सविता मिश्रा

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by savitamishra on October 5, 2014 at 4:49pm

गरीबी का मजाक उड़ाया गया है लघुकथा के बहाने से.....
इस तरह से यदि हम बोले तो हर कहानी या लघुकथा में किसी न किसी का उपहास ही किया जाता है विनोद भाई ...शुक्रिया आपका जो आपने अपना महत्वपूर्ण समय दिया

Comment by विनोद खनगवाल on October 5, 2014 at 2:05pm
गरीबी का मजाक उड़ाया गया है लघुकथा के बहाने से । विषय का चयन ठीक ढंग से नहीं कर पाई हैं । लघुकथा ना होकर एक संकीर्ण मानसिकता ही बनकर रह गई है। लघुकथा में केवल अपनी बात ही नहीं कहनी होती है कथा के प्रभाव पर भी विचार करना चाहिए। इससे लघुकथा के चरम को छुआ जा सकता है।
Comment by savitamishra on October 4, 2014 at 10:52pm

शुक्रिया गणेश बागी भाई आपका ......वैसे हमें लग रहा है हमने अपनी बात कही हैं ...हो सकता है भाषा पर पकड़ ना रख पायें हो |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 4, 2014 at 9:02pm

आदरणीया इस प्रयास हेतु बधाई प्रेषित है, मैं भी सुलभ जी से इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ।  

Comment by savitamishra on October 3, 2014 at 1:41pm

अच्छा ! ऐसा क्या ? फिलहाल शुक्रिया सुलभ भाई आपका

Comment by Sulabh Agnihotri on October 3, 2014 at 11:44am

सविता जी !
भई मजा नहीं आया !
पहली बात तो भाषा पर रियाज नहीं भरपूर रियाज की जरूरत है।
दोगलापन कहाँ है भाई। आपकी नायिका मन से कन्या खिलाने का ढोंग करती तब बात अलग थी, वह तो कभी तैयार ही नहीं थी फिर दोगलापन कैसा ?
अंत में कतई मारक क्षमता नहीं है, संदेश समझ ही नहीं आया। बिखरी-बिखरी सी लगी पूरी लघुकथा।

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