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प्रेम धुन

प्रिय मोहन
नाचत मन राधा
वेणुका धुन

विरह

टूटती आस
साजन घर नाहीं
फागुन मास

बुरी प्रथा

लोभी इंसान
लाचार हुआ बाप
लौटी बारात

डर

रात पहर
गरज रहें मेघा
सहमे मन


मजबूरी

यहाँ से वहाँ
आज कुछ ना मिला
भूखा सो गया

कृष्ण जन्म

भादो की रैना
मन में उत्सुकता
भयो जनम्

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by rajesh kumari on August 26, 2014 at 6:48pm

सुन्दर हाइकु ..बधाई आपको पवन जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 26, 2014 at 5:16pm

पवन जी आपकी कोशिश रचना में  नुमायाँ है i

कृपया ध्यान दे...

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