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ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

1222    1222    1222     1222
*********************************
जहन  की  हर  उदासी  से  उबरते तो सही पहले
जरा तुम नेह के पथ से गुजरते  तो सहीे पहले
**
हमारी  चाहतों  की  माप  लेते  खुद ही गहराई
जिगर  की  खोह में थोड़ा उतरते तो सही पहले
**
ये मिट्टी भी हमारी ही महक देती खलाओं तक
हमारे  नाम  पर  थोड़ा  सॅवरते तो सही पहले
**
तुम्हें भी धूप सूरज की बहुत मिलती दुआओं सी
घरों  से  आँगनों  में  तुम  उतरते तो सही पहले
**
गलत फहमी तुम्हारी भी ‘गॅवारों’ की उतर जाती
हमारे  गाँव  में   दो  पल  ठहरते  तो सही पहले
**
खुशी खुद ही फुदकती मेंमनों सी हर गली आँगन
गमों  के  बाज  के पर तुम कतरते तो सही पहले

**
( रचना - 8 अगस्त 2014 )


मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 670

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:04am

आदरणीय सौरभ भाई जी, सराहना और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:04am

आदरणीया राजेश बहन आपको गजल पसंद आयी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:02am


आदरणीय विजय मिश्र जी प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार । स्नेह बनाए रखें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:02am



आदरणीय भाई राकेश जी ,गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:01am


आदरणीया कल्पना बहन आपने सही कहा , जिस रोज हमें यह हुनर आ जाऐगा उस रोज हमद ुख का रोना बंद कर देगे । गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:01am


आदरणीय भाई जवाहर लाल जी गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:01am


आदरणीय भाई गोपाल नारायन जी , आपका आशीष पाकर गजल का मान और बढ़ गया । इस प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:01am


आदरणीय भाई गिरिराज जी गजल पर उपस्थिति देकर उसका मान बढ़ाने के लिए आभार । स्नेह बनाए रखें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 11:00am

आदरणीय भाई विजय शंकर जी गजल का अनुमोदन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद । आप सहित सभी प्रबु़द्ध जनों से क्षमा याचना चाहता हूं कि आपकी प्रतिक्रियाओं पर समय से धन्यवाद ज्ञापित नहीं कर सका । स्नेह बनाए रखें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 22, 2014 at 12:10am

आदरणीय लक्ष्मण जी,

एक अच्छे प्रयास से आने खुश कर दिया. कहन में अब इंगितों से कह रहे हैं. अच्छा है.

दाद कुबूल करें.

 

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