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नवगीत : जैसे कोई नन्हा बच्चा छूता है पानी

मेरी नज़रें तुमको छूतीं

जैसे कोई नन्हा बच्चा

छूता है पानी

 

रंग रूप से मुग्ध हुआ मन

सोच रहा है कितना अद्भुत

रेशम जैसा तन है

जो तुमको छूकर उड़ती हैं

कितना मादक उन प्रकाश की

बूँदों का यौवन है

 

रूप नदी में छप छप करते

चंचल मन को सूझ रही है

केवल शैतानी

 

पोथी पढ़कर सुख की दुख की

धीरे धीरे मन का बच्चा

ज्ञानी हो जाएगा

तन का आधे से भी ज्यादा

हिस्सा होता केवल पानी

तभी जान पाएगा

 

जीवन मरु में तुम्हें हमेशा

साथ रखेगा जब समझेगा

अपनी नादानी

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 823

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:37pm

बहुत बहुत धन्यवाद Maheshwari Kaneri जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:37pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कल्पना रामानी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:36pm

बहुत बहुत शुक्रिया annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:36pm

बहुत बहुत धन्यवाद Saurabh Mishra जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:36pm

बहुत बहुत धन्यवाद Chhaya Shukla जी

Comment by Maheshwari Kaneri on September 2, 2014 at 5:52pm

सुंदर गीत के लिए आपको हार्दिक बधाई

Comment by कल्पना रामानी on August 24, 2014 at 10:50pm

सुंदर गीत के लिए आपको हार्दिक बधाई

Comment by annapurna bajpai on August 14, 2014 at 11:50pm

सुंदर नवगीत , बधाई आपको 

Comment by Saurabh Mishra on August 12, 2014 at 3:35pm

Uttam

Comment by Chhaya Shukla on August 12, 2014 at 11:20am

बेहतरीन नवगीत के लिए हार्दिक बधाई धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी !

कृपया ध्यान दे...

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