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आत्मपीडा में अनुभूति सुख की लिए

दग्ध होता रहा अनुभवो  में सदा

सत्य ही उस करुण के ह्रदय कोश में

पल रहा कोई जीवंत अनुराग है i

 

मृत्यु आती नहीं चैन मिलता नहीं

युद्ध होता है विष चेतना में प्रबल

दंश लेता है जब फिर न देता लहर

क्रुद्ध फुंकारता नेह का नाग है i

 

मौन बेसुध पड़ा प्राण के अंक में

याद की वेदना में सजल जो हुआ

स्वेद-श्लथ गात में कुछ चुभन सी लिए

स्नेह सोया हुआ था गया जाग है  i

 

सिसकियो की व्यथा आंसुओ ने सुनी

वाग्देवी ने उसको मुखर कर दिया

मन चकित दर्प कवि-बोध का भ्रम लिए

सोचता इसमें क्या उसका प्रतिभाग है

 

शब्द-व्यायाम से गीत बनते नहीं

वेदना के बिना व्यर्थ  अनुराग है

गीत  तो आंसुओ में ढले है सदा

यदि ह्रदय  में प्रबल आग ही आग है i

 

(अप्रकाशित व मौलिक)

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Comment by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on July 20, 2014 at 1:11pm

शब्द-व्यायाम से गीत बनते नहीं

वेदना के बिना व्यर्थ  अनुराग है

गीत  तो आंसुओ में ढले है सदा

यदि ह्रदय  में प्रबल आग ही आग है i...........आ. डा.गोपाल  नारायण श्रीवास्तव जी ,बहुत अच्छी तरह मर्म को स्पर्श करती रचना के लिए बधाई।   

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 8:18am

आदरणीय डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,

आप ने व्यथा के अनुवाद की जीवनगत महायात्रा को एक लघु कायिक रचना में अत्यंत मार्मिक संवेदना-सिक्त शब्दों से भीगे वेदना गीत में परिणत कर दिया है ; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! --

"मृत्यु आती नहीं चैन मिलता नहीं

युद्ध होता है विष चेतना में प्रबल

दंश लेता है जब फिर न देता लहर

क्रुद्ध फुंकारता नेह का नाग है i

 

मौन बेसुध पड़ा प्राण के अंक में

याद की वेदना में सजल जो हुआ

स्वेद-श्लथ गात में कुछ चुभन सी लिए

स्नेह सोया हुआ था गया जाग है  i"

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:16pm

आदरणीय सरना जी

मै तो स्वयं आपकी कलम का मुरीद हूँ  i  आपसे प्रोत्साहन मिलने का अलग ही आनंद है i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:15pm

महनीया मंजरी जी

आपको शत शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:13pm

जीतू भाई i

आपका प्यार i ह्रदय से स्वीकार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:12pm

महनीया

बहुत  बहुत आभार  i आपके शब्द प्रेरणा के उत्स है मेरे लिए i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:10pm

आदरणीय निकोर जी

आपकी पुनः उपस्थित से मन भावुक हो गया i आपसे ऐसे ही स्नेह्की सतत अभिलाषा है i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 18, 2014 at 2:01pm

आदरणीय जैफ जी

आपका हृदय से आभार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 18, 2014 at 12:25am

आपकी रचना को बार-बार पढ़ा आदरणीय डा.गोपाल जी, बहुत ही सुंदर लगी..हर पंक्ति मन को झंझोड़ देती.  हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 17, 2014 at 10:21pm

आत्मपीडा में अनुभूति सुख की लिए

दग्ध होता रहा अनुभवो  में सदा

सत्य ही उस करुण के ह्रदय कोश में

पल रहा कोई जीवंत अनुराग है i-------बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ तप कर भी वही सोना बनता है जिसमे मिलावट नहीं अर्थात सच्चाई है बेशक पीड़ा सहना मगर दिल में सच्चाई बरकरार रखना ये भाव ऊँचाइयों को छूते हैं 

शब्द-व्यायाम से गीत बनते नहीं

वेदना के बिना व्यर्थ  अनुराग है

गीत  तो आंसुओ में ढले है सदा

यदि ह्रदय  में प्रबल आग ही आग है i

 सच कहा ह्रदय की आग की लपटें हीं वेदना को जन्मती हैं और वेदना शब्दों को तब कोई गीत बनता है 

बहुत सुन्दर प्रस्तुति सराहनीय ...हार्दिक बधाई आपको आ० डॉ गोपाल नारायण जी .

 

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