For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मिला जो, कब खुशी उससे समेटी यार लोगों ने - ग़ज़ल

********************************************
1222 1222 1222 1222
********************************************
जनम से आदमी हो, आदमी क्यों हो नहीं पाया
कि नफरत से भरे दिल में मुहब्बत बो नहीं पाया
***
सितारे तोड़ डाले सब, करम उसका यही है बस
खता मेरी रही इतनी कि जुगनू हो नहीं पाया
***
मिला जो, कब खुशी उससे समेटी यार लोगों ने
उसी का गम जिगर को है जमाने जो नहीं पाया
***
तुझे क्यों खांसना उसका दिनों में भी अखरता है
पिता जो तेरे बचपन में भरी शब सो नहीं पाया
***
न जाने कौन सी कालिख कहाँ से पोत लाए तुम
जनम गुजरा मगर मैं भी इसे सच धो नहीं पाया
***
‘मुसाफिर’ जिंदगी उसकी बता कैसी रही होगी
हँसी दुख में नहीं आई खुशी में रो नहीं पाया
***
( रचना -१८ मई २०१४ )
***
( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )
मौलिक और अप्रकाशित

Views: 665

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 5:30pm

आपके ग़ज़ल के लिए हार्दिक धन्यवाद, लक्ष्मण धामी जी.

आपकी सोच बहुत ही उन्नत है. जल्दबाजी से बचें और शेरों पर तनिक और समय दें तो बहुत कुछ और भी संयत ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है. ऐसा मेरा मानना है.

मतले में ही शुतुर्गुर्बा का ऐब लग रहा है.
जनम से आदमी हो, आदमी क्यों हो नहीं पाया
यह मिसरा कायदे से ऐसा होना था -

जनम से आदमी हो, आदमी क्यों हो नहीं पाये 

लेकिन इसे यों भी किया जा सकता है ताकि ग़ज़ल के रदीफ़ को संतुष्ट कर पाये -
जनम से आदमी ही आदमी क्यों हो नहीं पाया..   अब यह प्रश्न तार्किक भी लगता है.

इस शेर का मुझे कोई अता-पता नहीं मिल पाया -
मिला जो, कब खुशी उससे समेटी यार लोगों ने
उसी का गम जिगर को है जमाने जो नहीं पाया..  ..
अवश्य है, मेरी समझ में बात नहीं आयी है. माफ़ कीजियेगा


इस शेर पर दिल से दाद कुबूल करें, भाईजी -
तुझे क्यों खांसना उसका दिनों में भी अखरता है
पिता जो तेरे बचपन में भरी शब सो नहीं पाया

साथ ही मक्ता का तो भाईजी जवाब नहीं है.
बहुत-बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2014 at 10:32am

आ० भाई गुमनाम जी , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2014 at 10:31am

आ० भाई विजय निकोर जी ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया का अर्थ यही है की लेखन सफल हुआ l स्नेहाशीष बनाये आखें यही कामना है l

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 1, 2014 at 4:29pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है.................................बधाई,

Comment by vijay nikore on July 1, 2014 at 3:51pm

इस अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 10:09am

आ० बृजेश भाई उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l स्नेह बनाये रखें l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 10:08am

आ० भाई गिरिराज जी आपका स्नेहाशीष पाकर धन्य हुआ , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 10:05am

आ० भाई जीतेन्द्र जी ग़ज़ल आप तक पहुंची लेखन सार्थक हुआ हार्दिक धन्यवाद l

Comment by बृजेश नीरज on June 30, 2014 at 11:29pm
अच्छी ग़ज़ल। आपको बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 30, 2014 at 6:18pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

तुझे क्यों खांसना उसका दिनों में भी अखरता है
पिता जो तेरे बचपन में भरी शब सो नहीं पाया  --------- बात अन्दर तक लगी । बधाई भाई जी ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
23 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
23 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service