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बीच राह श्मशान बना दो

बीच राह श्मशान बना दो
इंसानों को यह समझा दो |

जीवन नश्वर है यह जानें
मृत्यु सत्य है उसको मानें
नफरत छोड़ प्यार सिखला दो

इंसानों को यह .......

रूप बड़ा ही सुन्दर पाया
काया ने कब साथ निभाया
साँच बुढ़ापे का दिखला दो

इंसानों को यह .......

यह जग एक मुसाफिरखाना
इसका राज नहीं जो जाना
राज यही उसको बतला दो

इंसानों को यह .......

रिश्ते सारे अजब अनूठे
पाश मोह ममता के झूठे
प्रीत ईश के संग लगा दो

इंसानों को यह .......

................................

..मौलिक व अप्रकाशित...

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Comment

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Comment by Sarita Bhatia on June 3, 2014 at 4:03pm

शुक्रिया सौरभ सर ,आशीर्वाद बनाये रखें 

Comment by Sarita Bhatia on June 3, 2014 at 4:02pm

भाई आशीष जी हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2014 at 12:40pm

कविता के निर्गुन पक्ष को उभारने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 30, 2014 at 12:02pm

वाह, बहुत सुन्दर !

Comment by Sarita Bhatia on May 29, 2014 at 8:15am

आदरणीय मुकेश जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on May 29, 2014 at 8:14am

आदरणीय गिरिराज सर हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on May 29, 2014 at 8:14am

वाह कुंती दीदी आपके अनुमोदन से मन प्रसन्न हुआ मेरी रचना सार्थक हुई 

Comment by Sarita Bhatia on May 29, 2014 at 8:13am

आदरणीया मीना जी हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 28, 2014 at 5:53pm

आदरणीय सरिता जी , आपकी जीवन का सत्य बताती , वीतरागी रचना के लिये आपको बधाई

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 28, 2014 at 2:52pm

 achhee rachnaaa - badhaaee

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