For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये - ग़ज़ल

1222/ 1222/ 1222/ 1222

यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये

पसे तस्वीर सूरत किसकी है पहचान ली जाये               पसे तस्वीर= तस्वीर के पीछे

 

ज़रा देखूँ कि सच कितना है तेरे इन दिखावो में

चलो कुछ देर को तेरी कही भी मान ली जाये         

 

कभी तो आप अपने तज़्रिबे से तौलें सच्चाई

ज़रूरी तो नहीं है हाथ में मीज़ान ली जाये                    मीज़ान =तराजू

 

नहीं लगती मुझे अनुकूल मौसम की तबीयत क्यूँ

बरस जायें न ओले जल्द ही छत तान ली जाये

 

घिरे हैं आफतों से इन दिनों अंजाम जो भी हो

हर इक दम सामना करने की दिल में ठान ली जाये

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 916

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 6:42pm

आदरणीय सौऱभ सर रचना की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार
मैंने गलती सुधार ली है बहुत बहुत शुक्रिया स्नेह यूँ ही बनाये रखें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 20, 2014 at 3:37am

वाह वाह शिज्जू भाईजी. दिल से दाद कुबूल करें

कुछ इक बातों.. नहीं कुछ इक बात कहना सही है. 

विश्वास है, आप इस व्याकरणीय दोष को एक बार देख कर मुझे भी सूचित करेंगे.  ताकि मैं भी संयत हो सकूँ.

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 7, 2014 at 8:58pm

आपका हार्दिक आभार भाई आशीष जी

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 5, 2014 at 8:55pm

वाह, खूबसूरत ग़ज़ल कही है भाई शिज्जु जी  !!

दाद क़ुबूल कीजिये !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 5, 2014 at 1:45pm

आदरणीय अरुण सर आपका हार्दिक  आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 4, 2014 at 9:19pm

कुछ इक बातों को अपने तज़्रुबे से तौल के देखें

ज़रूरत क्या कि अपने हाथ में मीज़ान ली जाये

वाह, वाह !!!!!!!!!!!!!!!!! उम्दा गज़ल....बधाई.................

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2014 at 3:55pm

आ0 शिज्जू भाईजी,  मेरे भी ख्याल में कुछ ऐसा ही विचार आया था।  मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सहित आपका हार्दिक आभार। सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2014 at 12:44pm

आपका हार्दिक आभार  आदरणीय केवल प्रसाद  जी आप सही हैं कुछ और हर की मात्रा गिरा के नही पढ़ा जा सकता दरअस्ल मैंने अलिफ वस्ल का प्रयोग किया है जैसे कुछिक, हरिक 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2014 at 11:44am

आ0 शिज्जू भाईजी, वाह बहुत खूब गजल कही है। हार्दिक बधाई स्वीकारें। किन्तु भाईजी कृपया मार्गदर्शन करे कि क्या 'कुछ' और 'हर' को गिरा कर 1 मात्रा में पढ़ा जा सकता है। सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2014 at 11:39am

आदरणीया कुंती जी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
14 hours ago
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
19 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service