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ग़ज़ल - पहले वो कभी आज तक ऐसे मिला नहीं

२२११    २२१२    २२१२    १२

कैसी ये मुलाकात है कोई गिला नहीं

पहले वो कभी आज तक ऐसे मिला नहीं

 

हाँ बात वो कुछ और थी जब साथ हम भी थे

अब सिर्फ इत्तेफ़ाक है, अब सिलसिला नहीं

 

वो जब से गया मुझको जैसे साथ ले गया

ढूँढा तो बहुत खुद को पर अब तक मिला नहीं

 

कुछ दिन से मेरे शहर का मौसम है अनमना

गुमसुम हैं सभी बागबां, गुल भी खिला नहीं

 

किस्से तो सभी दर्द के सुनते रहे मगर

जो बाँट सके गम को वो मुझको मिला नहीं

 

नेकी जो करो शौक से दरिया में डाल दो

सब कुछ तो यहाँ मिलता पर अच्छा सिला नहीं

 

संजू शब्दिता मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2014 at 10:58pm

किस्से तो सभी दर्द के सुनते रहे मगर

जो बाँट सके गम को वो मुझको मिला नहीं.........बहुत सुंदर, बधाई स्वीकारें आदरणीया संजू जी

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 5:16pm

शानदार ग़ज़ल लिखी है बधाई आपको आपको

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2014 at 1:32pm

किस्से तो सभी दर्द के सुनते रहे मगर

जो बाँट सके गम को वो मुझको मिला नहीं  आदरणीया संजू जी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये तहे दिल बधाई 

Comment by sanju shabdita on May 1, 2014 at 1:29pm

आदरणीया सरिता जी आपका हार्दिक आभार

Comment by sanju shabdita on May 1, 2014 at 1:18pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मुकेश चिराग जी

Comment by Sarita Bhatia on May 1, 2014 at 9:52am

वाह वाह संजू जी खुबसूरत गजल 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 30, 2014 at 10:23pm

आदरणीया संजू जी
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने..
मतला भी बेहद खूब.

कैसी ये मुलाकात है कोई गिला नहीं

पहले वो कभी आज तक ऐसे मिला नहीं

किस्से तो सभी दर्द के सुनते रहे मगर

जो बाँट सके गम को वो मुझको मिला नहीं

 

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