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कविता--मैं आज भी खडा हूँ उसी मोड़ पर

कभी जिस जगह हम मिले थे

जहाँ फूल मुहब्बत के खिले थे

मैं आज भी खड़ा हूँ उसी मोड़ पर

जहाँ तुम गये थे मुझे छोडकर

हँसी से कोई ऱिश्ता नहीं है

खुशी से दूर तक वास्ता नहीं है

जमाने की कितनी परवाह थी मुझे

अब जमाने की भी कोई परवाह नहीं है

गुजरते हैं लोग इस चौरेहे से

तेरी चर्चा करते हुये

मैंने बहुत को देखा है 

तेरे लिये आह भरते हुये

लेकिन उनकी आह भरने पर

मुझे तरस जरूर आता है

किआज भी हर कोई शख्स

तुझे पहचान नहीं पाता है

तेरे लुटे हुये को 

मैं कुछ आसरा देता हूँ

इसी बहाने आज भी

तेरा हाल जान लेता हूँ

उमेश कटारा

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Akhand Gahmari on April 30, 2014 at 11:16am

गुजरती है पास से

खुशबु से पहचान लेता हूॅु

बैठ कर कभी दर्द बाटा करते थे

आज दर्द को पी जाता हॅू

एक दम मित्र‍ दिल की बात आपने लिख दिया बधाई हो आपको

Comment by Shyam Narain Verma on April 30, 2014 at 10:39am
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई .........................
Comment by coontee mukerji on April 30, 2014 at 12:50am

कभी जिस जगह हम मिले थे

जहाँ फूल मुहब्बत के खिले थे

मैं आज भी खड़ा हूँ उसी मोड़ पर

जहाँ तुम गये थे मुझे छोडकर.....इंसान के  जीवन में कभी कभी ऐसा मोड़ आता है कि लगता है वक्त थम सा गया है.बहुत सुंदर रचना. हार्दिक बधाई.

Comment by umesh katara on April 29, 2014 at 6:17pm

shukriya Meena pathak ji

Comment by Meena Pathak on April 29, 2014 at 2:49pm

बहुत सुन्दर ,, बधाई आप को | सादर 

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