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(कामरूप छंद) नकल न करें-अकल लगायें -अखिलेशकृष्ण श्रीवास्तव

(1)

अंग्रेजियत का, दंभ भरते, क्या दिये संस्कार।

रावण बनें कुछ, कंस भी हैं, पूतना भरमार ॥

नारी सुरक्षा, देश रक्षा, विफल है सरकार।

हैं बलात्कारी, आततायी,  व्याप्त भ्रष्टाचार ॥

              

(2)

नेता लफंगे, संग चमचे, जब पधारे गाँव।

वो गिड़गिड़ायें, वोट माँगें, पकड़ सब के पाँव॥

जीते अगर तो, भूल से भी, दिखें न बदमाश।

मंत्री बने तो, देश का फिर, करें सत्यानाश॥

*संशोधित 

########################

(मौलिक व अप्रकाशित)

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव     

धमतरी (छत्तीसगढ़),  

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Comment

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 8, 2014 at 12:45pm

आदरणीय विजय  भाई

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद , आभार 

Comment by vijay nikore on April 8, 2014 at 12:37pm

सुन्दर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 7, 2014 at 6:31pm

आ० अखिलेश श्रीवास्तव जी,

//एक बात और ... दंभ भरते के स्थान पर ......... " रंग जिन पर "  लिखें तो क्या और भी बेहतर होगा ? //

रंग जिन पर, यदि करते हैं तो व्याकरणिक रूप से पंक्ति अशुद्ध हो जाएगी 

ज़रा देखिये .... //अंग्रेजियत का , रंग जिन पर, क्या दिए संस्कार// ...................इस पंक्ति में तो दिए सही नहीं लगेगा या तो फिर 'क्या वो दें संस्कार' ऐसा कुछ होना चाहिए 

दूसरी बात ... 

अपनी ब्लॉग पोस्ट को तो रचनाकार ऑप्शन में जाकर स्वयं ही एडिट कर सकते हैं....बस रचना उसके बाद अप्रूवल में चली जाती है. बहराल...अब तो आपकी रचना संशोधित हो ही चुकी है.

सादर.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 7, 2014 at 12:35pm

आदरणीया कुंती जी,

सच कहती हैं भुगतना हर हाल में आम जनता को है, तरबूज तो वही है। नेताओं का कुछ बिगड़ता नहीं।

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद , आभार  

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 7, 2014 at 9:48am

आदरणीय जितेन्द्र भाई

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद , आभार , सब कुछ ओबीओ से ही सीख रहा हूँ ।

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 7, 2014 at 9:45am

आदरणीय लक्ष्मण भाई

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद , आभार 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 7, 2014 at 9:44am

आदरणीया प्राचीजी,

एडमिन महोदय से संशोधन हेतु अनुरोध के  24 घंटे बीत गये , शायद उस कक्ष में फिलहाल कोई नहीं है। 

एक बात और ... दंभ भरते के स्थान पर ......... " रंग जिन पर "  लिखें तो क्या और भी बेहतर होगा ? अगर ऐसा है तो वह भी कर दीजिए । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 7, 2014 at 8:57am

बहुत सुंदर ,हर एक विधा में आपकी रचनाओं का अंदाज, निराला होता है आदरणीय अखिलेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 6, 2014 at 5:36pm

सुन्दर और सामयिक छंद रचना पस्तुति के लिए हार्दिक बधाई श्री अखेलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:57pm

आदरणीय बड़े भाई , बहुत सुन्दर कामरूप छंद रचना की है आपने , सुधार के बाद रचना और सुन्दर लगेगी !! आपको बधाइयाँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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