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सैर फरवरी की धूप में

फरवरी की धूप में

बिखरे -२ से रूप में

चल रही थी मौज में

मीठी मीठी सी धूप में

ख्याल कई थे सोच में

कल से आते आज में

चाप सी पड़ती कान में

पायल पहनी थी पाँव में

भीगती सुनहरी धूप में  

उजली उजले से रूप में

ध्यान लौटा वर्तमान में

पतंगे झूलती आसमान में

बच्चे चेह्कते बागान में

मांझा कसे वो हाथ में 

बसंत था पूरी शान में

यौवन भी था गुमान में

गुल मिलते  गुलिस्तान में

कुछ आँखें  थी सुराग़ में 

बातें थी घूमती  ज़ुबान में

बात दबाई मैंने इक मुस्कान में

 ध्यान गया  अल्हान में

बांसुरी बेचता सस्ते दाम में 

चहल पहल थी आम में

बसंत पंचमी की शान में

देखती मैं सब आराम से 

पहुंची घर इसी दौरान में

फरवरी की धूप में

बिखरे -२ से  रूप में

चल रही थी मौज में

मीठी मीठी सी धूप में

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Comment

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Comment by Veerendra Jain on February 9, 2011 at 6:39pm
Venus ji...ache bhav hain...badhai ...

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