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हर बार - (रवि प्रकाश)

उस पार किनारा होगा,हर बार यही लगता है;
कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है।
मंज़िल पे जा निकलेंगे,ये ऊँचे-नीचे रस्ते;
फिर दौर हमारा होगा,हर बार यही लगता है॥
.
तपती राहों पे चल कर,
सूरज से आँख मिलाना;
रातों की बेचैनी को,शबनम के घूँट पिलाना।
बेकार न होंगे आँसू,नाकाम न होंगी आहें;
हर दर्द सहारा होगा,हर बार यही लगता है।
कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है॥
.
अक्सर कच्ची नींदों में,टूटे हैं बहुत से सपने;
उलझे हैं कहीं पे नाते,छूटे हैं कहीं पे अपने।
लेकिन दो ही दिन का है,ये तन्हाई का मौसम;
फिर मेल दुबारा होगा,हर बार यही लगता है।
कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है॥
.
वो लहर कहीं तो होगी,जो साहिल से टकराए;
वो सहर कभी तो होगी,जो परियों सी शरमाए।
गुलशन के सारे काँटें,कलियाँ बन के चटकेंगे;
फूलों में गुज़ारा होगा,हर बार यही लगता है।
कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है॥
.
-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-11.03.2014

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Comment by Ravi Prakash on April 2, 2014 at 7:12pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आ॰ सौरभ जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by Ravi Prakash on April 2, 2014 at 7:09pm
इतने सूक्ष्म विश्लेषण के लिए कोटि कोटि धन्यवाद आ॰ प्राची जी।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 26, 2014 at 7:30pm

आपकी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद भाईजी. हार्दिक शुभकामनाएँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 24, 2014 at 3:32pm

मंज़िल पे जा निकलेंगे,ये ऊँचे-नीचे रस्ते;
फिर दौर हमारा होगा,हर बार यही लगता है॥

यही हौसला ज़िंदगी को सकारात्मक नज़रिए और सोच के साथ आगे बढाता है

तपती राहों पे चल कर,
सूरज से आँख मिलाना;.......................वाह बहुत सुन्दर

 

अक्सर कच्ची नींदों में,टूटे हैं बहुत से सपने;
उलझे हैं कहीं पे नाते,छूटे हैं कहीं पे अपने।
लेकिन दो ही दिन का है,ये तन्हाई का मौसम;
फिर मेल दुबारा होगा,हर बार यही लगता है।........................बहुत सुन्दर शब्दों में अपने मन की बात कही है, वाह

 

यह गीत बहुत पसंद आया आ० रवि प्रकाश जी

आपको बहुत बहुत बधाई

 

Comment by Ravi Prakash on March 14, 2014 at 10:16am
धन्यवाद आ॰ गीत जी।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 13, 2014 at 11:32pm

बहुत सुंदर रचना आदरणीय रवि जी, आपको हार्दिक बधाई

Comment by Ravi Prakash on March 12, 2014 at 2:10pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आ॰ विजय मिश्र जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by Ravi Prakash on March 12, 2014 at 2:08pm
कोटिश: धन्यवाद आ॰ मयंक जी।
Comment by विजय मिश्र on March 12, 2014 at 10:48am
बहुत मुलायम जमीन दियी है भाई रविजी इस खूबसूरती से लदी मिजाज तर करती कविता को ---- " वो सहर कभी तो होगी,जो परियों सी शरमाए। "

हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ |
Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 11, 2014 at 11:22pm

क्या बात है...मेरी ओर से १०० में १००...बधाई हो आदरणीय 

कृपया ध्यान दे...

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