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मन – पाँच दोहे

************

मन को मत कमजोर कर , फिर से होगी भोर

फिर से गुनगुन धूप में , नाचेगा मन मोर 

 

मन, आखें मीचे अगर , खूब मचाये शोर

आँख अगर हो  देखती , मन भटके चहुँ ओर

 

खाली मन चिंता करे , मन का बस ये काम

बांधो इसको काम से , कभी न दो आराम

 

मन का ले के साथ तू , मन से हो जा दूर

मन के बन्धन में रहा , वो लगता मज़बूर

 

जब तक मन का राज है, मन मनवाये बात   

तू राजा जिस दिन हुआ , मन की क्या औकात    

 

मौलिक एवँ अप्रकाशित  ( संशोधित )

***********************************

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 12, 2014 at 9:47pm

आदरणीया वन्दना जी , दोहों के पसन्द करने के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by vandana on February 12, 2014 at 9:34pm

 

खाली मन चिंता करे , मन का बस ये काम

बांधो इसको काम से , कभी न दो आराम

 

मन का ले के साथ तू , मन से हो जा दूर

मन के बन्धन में रहा , वो लगता मज़बूर

सुन्दर भाव हैं आदरणीय 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 12, 2014 at 8:44pm

आदरणीय श्याम नारायन भाई , दोहों की सराहना के लिये आपका बहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 12, 2014 at 8:43pm

आदरणीया सरिता जी , दोहों की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका बहुत बहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 12, 2014 at 8:42pm

आदरणीय बड़े भाई अखिलेश जी , आपका बहुत शुक्रिया , दोहों की सराहना के लिये ॥

Comment by Shyam Narain Verma on February 12, 2014 at 4:59pm
बहुत सुन्दर दोहे बधाई .. .............
Comment by Sarita Bhatia on February 12, 2014 at 2:53pm

बधाई आदरणीय इन खुबसूरत दोहों के लिए

खाली मन चिंता करे , मन का बस ये काम

बांधो इसको काम से , कभी न दो आराम

 

मन का ले के साथ तू , मन से हो जा दूर

मन के बन्धन में रहा , वो लगता मज़बूर

 

जब तक मन का राज है, मानो उसकी बात   

तू राजा जिस दिन हुआ , मन की क्या औकात

 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on February 12, 2014 at 11:31am

छोटे भाई गिरिराज, 

सुंदर दोहों की बधाई, पूरे मन से ॥

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