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ग़ज़ल : नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

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सभी से आँख चुराकर सम्हाल रक्खा है

नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है

 

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे

वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

 

तेरे चमन से न जाए बहार इस खातिर

हृदय में आज भी पतझर सम्हाल रक्खा है

 

चमन मेरा न बसा, घर किसी का बस जाए

ये सोच जिस्म का बंजर सम्हाल रक्खा है

 

तेरे नयन के समंदर में हैं भँवर, तूफाँ

किसी के प्यार ने लंगर सम्हाल रक्खा है

 

तुझे पसंद जो आया सनम वही मैंने

ग़ज़ल में आज भी तेवर सम्हाल रक्खा है

--------

(मौलिक एवं प्रकाशित)

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Comment by MAHIMA SHREE on February 11, 2014 at 10:55pm

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे

वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

 

तेरे चमन से न जाए बहार इस खातिर

हृदय में आज भी पतझर सम्हाल रक्खा है....बहुत खूब आदरणीय धर्मेन्द्र जी ... हार्दिक बधाई आपको /


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 11, 2014 at 9:17pm

वाह आदरणीय धर्मेन्द्र सिंहजी बेहतरीन ग़ज़ल है सारे अशआर अच्छे हुये हैं बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 11, 2014 at 8:45pm

तुझे पसंद जो आया सनम वही मैंने

ग़ज़ल में आज भी तेवर सम्हाल रक्खा है ---------------बहुत बढिया

बहुत बहुत बधाई आदरणीय धर्मेन्दजी

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 11, 2014 at 8:21pm

सुन्दर गजल । दाद कुबूल करें। आ0 धर्मेन्द्र भार्इ जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2014 at 10:18pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , बहुत बढ़िया गज़ल कही है , सभी अशाअर बहुत अच्छे लगे ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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