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लो,फिर याद आई
आँसुओं की बाढ़ आई
थी उनके करीब इतने
वो थे मुझमे मै थी उनमे |

कहा था कभी
चली जायेगी ससुराल  
कैसे रहूँगा तुम बिन,
खुद छोड़ गये साथ
ये भी ना सोचा  
कैसे रहूँगी उन बिन |

बरसों बीत गये
निहारते हुए राह
ना कोई सन्देश ना कोई तार
खड़ी हूँ अब भी वहीं
संभाले दर्द का सैलाब  
छोड़ गये थे पापा जहाँ |

मीना पाठक 

मौलिक/अप्रकाशित 
  
 
   

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Comment by ram shiromani pathak on February 10, 2014 at 2:48pm

सुन्दर मर्मस्पर्शी प्रस्तुति आदरणीया हार्दिक बधाई आपको//////////   सादर

Comment by Meena Pathak on February 10, 2014 at 12:51pm

सादर आभार आदरणीय आशुतोष जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 8, 2014 at 2:19pm

इस मर्मस्पर्शी रचना हेतु आपको हार्दिक बधाई ..सादर 

Comment by Meena Pathak on February 8, 2014 at 11:54am

आदरणीय रमेश जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on February 8, 2014 at 11:53am

आदरणीय कुन्ती दी सादर आभार स्वीकार कीजिये 

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 7, 2014 at 7:25pm

आदरणीया मीनाजी, हृदय को छूती इस रचना के लिये कोटिश बधाई

Comment by coontee mukerji on February 6, 2014 at 11:48pm

बहुत मर्मस्पर्शी रचाना है..,हार्दिक बधाई.

Comment by Meena Pathak on February 6, 2014 at 4:30pm

प्रिय जितेन्द्र जी .. आभार 

Comment by Meena Pathak on February 6, 2014 at 4:29pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ...बहुत बहुत आभार ..

Comment by Meena Pathak on February 6, 2014 at 4:23pm

आदरणीया कल्पना दी ..बहुत बहुत आभार | सादर 

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