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गज़ल -मेरे पीछे रुधन क्यों है

1222 1222

मेरे पीछे रुधन क्यों है
ये अश्कों का बज़न क्यों है

सजाया है जनाजे पर
उधारी का कफ़न क्यों है

कमायी पाप से दौलत
न काफी फिर ये धन क्यों है

बजा कर लाश पर बाजे
जगाने का जतन क्यों है

चले गोरे गये लेकिन
रुआँसा ये वतन क्यों है

हजारों घर जलाकर भी
ये माथे पर शिकन क्यों है


मौलिक एंव अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 1123

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 19, 2013 at 4:40pm

एक अच्छे प्रयास के लिए सादर धन्यवाद, आदरणीय.

यह रुधन और बज़न क्या हैं .. यही समझ में नहीं आया.

सादर

Comment by umesh katara on December 16, 2013 at 8:37pm

शुक्रिया विजय जी

Comment by vijay nikore on December 13, 2013 at 11:47pm

बहुत सुन्दर गज़ल है।बधाई।

Comment by umesh katara on December 13, 2013 at 8:16am

आदरणीय Baidya Nathji आपका आभार

Comment by umesh katara on December 13, 2013 at 8:16am

आदरणीया Annapurna bajpai ji आपका आभार

Comment by annapurna bajpai on December 12, 2013 at 8:49pm

सुंदर गजल , बधाई आपको । 

Comment by Saarthi Baidyanath on December 12, 2013 at 8:09pm

बजा कर लाश पर बाजे
जगाने का जतन क्यों है...बेमिशाल ख्याल ...उम्दा ...

Comment by umesh katara on December 12, 2013 at 8:09am

shukriya Priyanka singh ji apka

Comment by Priyanka singh on December 11, 2013 at 10:22pm

बहुत खूब सर…… 

Comment by umesh katara on December 11, 2013 at 7:24pm

आदरणीय अखिलेश दुबे जी आभार

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