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पिता जी की डायरी से....

पिता जी की डायरी से....

हाय भगवन क्या दिखाया ,
शांति मन में विक्रांति लाकर .
सरज का नव पुष्प कोमल , 
अग्नि ज्वाला में फसाकर,
वेड ही दिवस महिना ,
श्वेत ही वर्ण था निशा का,
शास्त्र ही दिन शेष था.
सूर्य था पश्चिम दिशा का.
उत्साह का उस दिन था पहरा ,
नयन सबही के खिले थे.
एक वर वधु के व्याह में ,
दर्शक बने मन मुग्ध होंगे ,
कला और विज्ञानं,
 सब के चित्त की चोरी करेंगे
आनंद की सरिता बहेगी .
भाव मेरी भी तरंगित ,
आश में ही पल चुकी थी .
नयन की अर्जी से पहले,
मन की मर्जी मिल चुकी थी.
पाँव मेरे चल पड़े थे ,
छोड़ मन को एक किनारे ,
अनजान ही कुछ कर रहे कर,
प्राप्त नयनों के सहारे .
गुथा गए कर जा कहीं पर,
दिल ये दौड़ा था छुड़ाने .
हर गयी उसकी भी ताकत ,
कर न कुछ पाया न जाने .
हाय खंडित हो चला सब ,
मौत के द्वारे खड़ा था,
हाथ में विद्युत् पड़ी थी ,
आह भर वेवस पड़ा था.
एक भी छन भी न बीता ,
 छीन  सब कुछ ले लिया था.
जिंदगी के प्यार में ,
मुझको महा गम दे दिया था.
देख कर मेरी दशा ,
विधि ने दया मुझ पर दिखाया .
हाथ कम्पित से फिसल कर ,
ज्वाल खुद ही निम्न आया.
दोष मैं किसका बताऊँ ,
रंज मालिक हो गए थे .
बात हम सब कुछ समझ कर ,
उस समय में सो गए थे.
-----------------------------अवधेश कुमार तिवारी 

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Comment

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Comment by R N Tiwari on February 1, 2011 at 10:15pm
आप  लोगों  के  मर्मस्पर्शी विचारों को पढ़कर महसूस हुआ की भोजपुरी समाज की भावुकता अद्वितीय और बेमिशाल है. बहूत बहूत धन्यवाद..
---आर .एन .तिवारी
Comment by Abhinav Arun on January 25, 2011 at 11:25am
 

जीवन के अनुभव अपने आप में एक काव्य अनुभूति होते हैं | इनकी मधुर अभिव्यक्ति है इस रचना में | कोटिश धन्यवाद इस रचना को ओ.बी.ओ. के ज़रिये हम तक लाने के लिये आर.एन. तिवारी जी

Comment by guddo dadi on January 24, 2011 at 11:00am

 

इतना दर्द भावनाओं में


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 24, 2011 at 9:06am

सर्व प्रथम तो आदरणीय अवधेश कुमार तिवारी जी को कोटिश: प्रणाम , और आप को बहुत बहुत धन्यवाद जो एक मोती की क्गुब्सुरत चमक से हम सब को रूबरू कराया | बेहद खुबसूरत काव्य कृति |

एक बार पुनः धन्यवाद RN तिवारी जी |

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