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तमन्ना यही एक पूरी खुदा कर : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम

तमन्ना यही एक पूरी खुदा कर,
जमी ओढ़ लूँ मैं फलक को बिछा कर,

शुकूँ से भरी नींद अँखियों को दे दे,
दुआओं तले माँ के बिस्तर लगा कर,

बढ़ा हौसला दे मेरी झोपड़ी का,
बुजुर्गों के आशीष की छत बना कर,

अमन शान्ति का शुद्ध वातावरण हो,
मुहब्बत पिला दे शराफत मिला कर,

सितारों भरी एक दुनिया बसा रब,
अँधेरे का सारा जहाँ अब मिटा कर..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:12pm

हार्दिक आभार आदरणीया कुंती जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:12pm

हार्दिक आभार आदरणीय अजय शर्मा जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:11pm

आदरणीय गिरिराज सर बहुत बहुत धन्यवाद आपका, फ़लक ओढ़ लूँ मै ज़मीं को बिछा कर बहुत ही उचित सलाह है मैंने स्वयं भी पहले यही लिखा था बाद में पलट दिया जानबूझ कर मैंने सोचा थोडा अलग करते हैं. अँधेरे की जगह अँधेरों कर लेता हूँ आदरणीय स्नेह यूँ ही बना रहे.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:09pm

हार्दिक आभार आदरणीय आशुतोष सर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:08pm

हार्दिक आभार आदरणीय गोपाल सर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:08pm

हार्दिक आभार आदरणीया सरिता जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 6, 2013 at 12:09pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल...प्रिय अरुण अनंत जी 

दिल से लिखे गए सभी के सभी अशआर सीधे दिल तक ही पहुँच रहे हैं 

इन तीन अशआर नें तो काफी देर तक रोके रखा..

शुकूँ से भरी नींद अँखियों को दे दे, 
दुआओं तले माँ के बिस्तर लगा कर,

बढ़ा हौसला दे मेरी झोपड़ी का, 
बुजुर्गों के आशीष की छत बना कर,,.............बहुत सुन्दर 

अमन शान्ति का शुद्ध वातावरण हो,
मुहब्बत पिला दे शराफत मिला कर,..........वाह!

बहुत बहुत शुभकामनाएं..

Comment by Tapan Dubey on December 6, 2013 at 11:48am

क्या बात क्या बात वाह वाह मजा आ गया भाई पड  कर अरुन भाई बहुत अच्छा लिखते है आप

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 6, 2013 at 11:08am

शुकूँ से भरी नींद अँखियों को दे दे,
दुआओं तले माँ के बिस्तर लगा कर,............मन को छू गया

बढ़ा हौसला दे मेरी झोपड़ी का,
बुजुर्गों के आशीष की छत बना कर,..............आत्मीय कामना

आदरणीय अरुण अनंत जी, हृदय को झंझोड़ देती गजल , दिली दाद कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 6, 2013 at 7:47am

अच्छी ग़ज़ल हुई है भाई अरूण जी बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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