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"क्या? आपने धूम्रपान छोड़ दिया? ये तो आपने कमाल ही कर दिया।"
"आखिर इतनी पुरानी आदत को एकदम से छोड़ देना कोई मामूली बात तो नहीं।"
"सही कहा आपने, ये तो कभी सिगरेट बुझने ही नही देते थे।"
"जो भी है, इनकी दृढ इच्छा शक्ति की दाद देनी होगी।"
"इस आदत को छुड़वाने का श्रेय आखिर किस को जाता है?"
"भाभी को?"  
"गुरु जी को?"
"नहीं, मेरी रिटायरमेंट को।"उसने ठंडी सांस लेते हुए उत्तर दिया।
.
.
(मौलिक व अप्रकाशित) 

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 3, 2013 at 12:06pm

धन्यवाद भाई बृजेश नीरज जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 3, 2013 at 12:04pm

रचना का मर्म समझने के लिए सादर आभार आ० सरिता भाटिया जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 3, 2013 at 12:03pm

भाई राहुल देव जी, इस No comment से आपका क्या तात्पर्य है ? रचना स्तरहीन या घटिया है याकि रचना समझ नही आई? अच्छा होता अगर इस और इशारा किया होता। नहीं तो ऐसी फेसबुकिया टिप्प्णी (No comment) देने में अपने शब्दों को व्यर्थ न ही करते तो बेहतर होता। सप्रेम व सादर अनुरोध है कि टिप्प्णी करते हुए रचनाकार की नहीं तो कम से कम इस मंच की गरिमा का ध्यान तो अवश्य रखा करे।    

Comment by aman kumar on December 3, 2013 at 9:50am

यथार्थ परक कथा ........

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 3, 2013 at 8:45am

सच! इन्सान की कुछ आदतें, समय के परिवर्तित होने पर अचानक बदल जाती है, चाहे उन आदतों के सहारे उसने अपने जीवन का बहुत लम्बा समय व्यतीत किया हो, बहुत सार्थक सन्देश देती लघुकथा पर बधाई स्वीकारें आदरणीय योगराज जी

Comment by वेदिका on December 3, 2013 at 12:02am

वाह! क्या कहना! हार्दिक बधाई आ० योगराज जी!

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2013 at 11:33pm

बहुत ही गहन बात आदरणीय।।।।।।।।।।

Comment by annapurna bajpai on December 2, 2013 at 11:26pm

सही है , रिटायर होने के बाद काफी आदते खुद ब खुद बदल जाती है । आपको हार्दिक बधाई आ0 योगराज जी । 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on December 2, 2013 at 10:55pm

सुन्दर लघुकथा हेतु कोटिश: बधाई माननीय योगराज सर!! 

Comment by Lata R.Ojha on December 2, 2013 at 8:06pm
Dukhti rag pe haath...

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