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मौन के शव  ?

बोलते चुपचाप

बात करते आप

रौंदते है मूक अन्तस को

बधिर होता है हाहाकार

दग्ध पर नहीं होते वो

ध्वंस लेता है फिर आकार

यही होता है प्रकृति में 

भावनाओ की विकृति में

सतत क्रम सा बार बार

सभी है सहते उसे

और हाँ कहते उसे

निष्ठुर प्रेम ! 

 

 

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:50pm

अति उत्तम रचना आदरणीय गोपाल जी, बधाई स्वीकारें | सादर 

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 1:31pm

waaaaaaaaaah gahan bhaavon kee sundr prastuti....viprit bhaav ke alnkaarik pryog is rachna kee jaan hain....

antim pankti pooree rachna ka saar ....kuch n kah ke bhee sab kuch kah gayee...bhut sundr...hmaaree dilee daad kabool farmaayen aa.Dr.Gopal Narain Shrivastav jee

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 10:56am

ब्रजेश जी

आपके उत्साहवर्धन से आप्यायित हुआ i

बहुत बहुत धन्यवाद i

Comment by बृजेश नीरज on November 30, 2013 at 9:04am

बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2013 at 10:43pm

माननीया  अनुपमा जी

मौन  के शव - पर आपके प्रोत्साहन को धन्यवाद  i

ऐसी रचनाओ पर प्रायशः लोग अधिक ध्यान नहीं देते  i

आपको पुनश्च आभार i

Comment by annapurna bajpai on November 29, 2013 at 10:34pm

गूढ अर्थ से भरपूर आपकी रचना निस्संदेह बेहद खूबसूरत है । आपको बधाई आदरणीय गोपाल नारायण जी । 

कृपया ध्यान दे...

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