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गजल-अब मैं थक कर हार रहा हूँ--उमेश कटारा

बह्र--222 221 122

लुट लुट कर बदहाल रहा हूँ
गम के आँसू पाल रहा हूँ 

जीवन से ता उम्र लडा मैं
हथियारों को डाल रहा हूँ

किस्मत ने भी खूब नचाया

मैं पिटता सुरताल रहा हूँ

सब हमको ही बेच रहे थे

सस्ता बिकता माल रहा हँ


मकडी मरती आप उलझकर

खुदको बुनता जाल रहा हूँ

मरजाऊँ तो आँख न भरना
मैं अश्कों का ताल रहा हूँ 

कर बैठा मैं प्यार अनौखा
रो रोकर बे-हाल रहा हूँ

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on November 23, 2013 at 10:46pm

आदरणीय उमेश जी,अच्छी कोशिश के लिए आपको बधाई...

 आदरणीय गिरिराज जी से मै सहमत हूँ । उन्होने सही सुझाव दिया  हैं। ओ बी ओ एक ऐसा मंच है जहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलता है । कृपया इन लिंक्स से लाभ उठाएँ  ग़ज़ल की बातें ,  ग़ज़ल की कक्षा (मै भी यहीं से सीख रहा हूँ )

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 23, 2013 at 9:22pm

आदरणीय उमेश भाई , आपने गज़ल कही है तो , मतले मे ही काफिया नही निभाया गया है  और आगे बाक़ी शे र मे भी क़ाफिया मे गड़्बडी है , अभी आपकी रचना गज़ल के शिल्प मे नही है , कृपा कर क़ाफिया तय कर लें , ताकि ये गज़ल की श्रेणी मे आ सके !!!

!!!!!!!!! सुन्दर भावों और विचारों के लिये आपको बधाई !!!!!!!!!!!!!

कृपया ध्यान दे...

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