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ग़ज़ल - कुछ नई बात है सबाओं में - पूनम शुक्ला

2122. 1212. 22

जाने क्या बात है हवाओं में
मीठी मिश्री घुली सदाओं में

ऐसी वैसी नहीं ये रातें हैं
चाँदनी खोजतीं खलाओं में

शबनमी रात ने कहा कुछ है
कुछ नई बात है सबाओं में

रात का है असर अभी ऐसा
जामुनी रंग है अदाओं में

रोशनी छीन ले जो वो मेरी
ऐसी ताकत नहीं ज़फाओं में

जिन्दगी आज सोचती है ये
जादुई बात थी सजाओं में

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 5:07am

इस खूबसूरत प्रस्तुति हेतु बहुत बहुत बधाई आ0 पूनम जी...

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2013 at 12:18pm

आदरणीया पूनम जी ..इस सुंदर ग़ज़ल केलिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ..मीठी मिश्री घुली सदाओं में २१२२ की जगह २२१२ जैसा लग रहा है ..सिर्फ अपनी जानकरी के लिए जानना चाहता हूँ ..सादर 

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