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क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो ( गीत ) गिरिराज भंडारी

       क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो

 

गर्मी में तुम चन्द्र किरण हो

और शीत में ताप अगन हो

मेरा जीवन थामा  जिसने

तुम मेरा वो प्राण- पवन हो 

       मुझमे जीती तुम ममता हो

       क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो

तुम मेरा जीवन सम्बल हो

बाहर अन्दर तुम ही बल हो

तुम अतीत हो वर्तमान हो

आने वाला तुम ही कल हो

     तुम ही मेरा अता पता हो

     क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो

 

दिवा स्वप्न मेरे जीवन का

तुम उत्तर हो हर कारण का

जोड़ जिसे निर्माता खुश है

हम दोनों का वो बंधन हो

           मुझको धेरी एक लता हो

           क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो

मै नदिया तुम आर  पार हो

बीच भँवर मै तुम किनार हो

मै जीता  हूँ सभी  भाव  में

तुम केवल मधु भाव प्यार हो

         तुम ही  मेरी प्रियंवदा हो

         क्या बोलूँ तुम मेरे क्या हो

 


*******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 22, 2013 at 8:12pm

आदरणीय केवल भाई , गीत के अनुमोदन के लिये और उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 22, 2013 at 8:09pm

आदरणीय सन्दीप भाई . गीत मे उत्साह वर्धन प्रतिक्रिया कर उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ !!!!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 22, 2013 at 8:08pm

आदरणीय अभिनव अरुण भाई , गीत को मान देने और उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!!!!!!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 22, 2013 at 7:03pm

आदरणीय भण्डारी भार्इ जी! सादर प्रणाम! --//दिवा स्वप्न मेरे जीवन का
तुम उत्तर हो हर कारण का.....//   बहुत ही सौम्य सुन्दर गीत। तहेदिल से दाद कुबूल करे। सादर,

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 22, 2013 at 7:01pm

वाह वाह आदरणीय इस लाजवाब गीत के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें

जय हो

Comment by Abhinav Arun on October 22, 2013 at 2:40pm

आ.गिरिराज भंडारी जी मोहक मधुर मनोहर रचना ...हार्दिक बधाई
!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 22, 2013 at 2:04pm

आदरणीय राणा प्रताप सर , आपकी प्रतिक्रिया सर्व प्रथम देख कर आनन्द हुआ !!! आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिये आपका दिल से आभारी हूँ !!! आपकी सलाह सर माथे पर !!! एक एक लाइन जोड़्ने का प्रयास किया हूँ  !!! रचना संसोधन के लिये भेज रहा हूँ !!! आपका पुनः आभार !!! ऐसे ही स्नेह बनाये रखें !!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 22, 2013 at 11:58am

आदरणीय गिरिराज जी बहुत ही सुन्दर गीत प्रस्तुत किया है| मुखड़े की पंक्ति से तुक रखने वाली एक एक पंक्ति यदि हर बंद में जोड़ दिया जाये तो गीत, गीत की कसौटी पर खरा भी उतरेगा और आनंद में भी बढ़ोत्तरी हो जाएगी|

सादर

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