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भेज रहा हूँ तुझे निमंत्रण........अरुण कुमार निगम

जीवन क्या है ? तुहिन सूक्ष्म कण
क्यों ना तुझ पर करूँ समर्पण....

दूर्वादल के क्षणिक पाहुने
संग लिये आती है ऊषा
प्राची के आँचल में रश्मि
बिखरा देती है मंजूषा
बीन-बीन ले जातीं किरणें
तुहिन बिंदु सम जीवन के क्षण......

ना द्युति मेरी,ना छवि मेरी
है सारा सौंदर्य पराया
बल गुरुत्व का, देह सँवारे
मन को लुभा रही है माया
तृषा बढ़ाती मृग-तृष्णायें
फैलाकर अपना आकर्षण......

उतरा था कल शून्य व्योम से
कुछ पल में है वापस जाना
स्पंदन का कहाँ बसेरा
जब श्वासों का नहीं ठिकाना
पग-पग रिझा रहा है फिर भी
जगती का मायावी दर्पण......

अपनी इच्छा से कब आया
तू ही लाया , तू ले जाना
रंगमंच का सूत्रधार तू
तेरा ही सब ताना-बाना
मिलन-आस का दीप जलाये
भेज रहा हूँ तुझे निमंत्रण......

(मौलिक व अप्रकाशित)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on October 20, 2013 at 11:24am

बहुत बधाई आपको इस रचना के लिए .

Comment by Neeraj Neer on October 20, 2013 at 11:24am

बहुत ही सुन्दर एवं उत्कृष्ट रचना .. भाव एवं शब्द दोनों एक दुसरे के मनो पूरक बन गए 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 20, 2013 at 10:26am

बेहद सुंदर रचना, सुंदर शब्द सयोंजन आप के अनुभव की पराकाष्ठा को सदा दिखलाता है, बहुत बहुत बधाई आदरणीय अरुण निगम जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 20, 2013 at 10:06am

वाह आदरणीय अरुण जी बहुत खूबसूरत रचना बधाई स्वीकार करें

Comment by coontee mukerji on October 20, 2013 at 1:11am

उतरा था कल शून्य व्योम से
कुछ पल में है वापस जाना
स्पंदन का कहाँ बसेरा
जब श्वासों का नहीं ठिकाना
पग-पग रिझा रहा है फिर भी
जगती का मायावी दर्पण......अति सुंदर नवगीत'


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 20, 2013 at 12:48am

प्रकृति और उसके कारकों का जो सूक्ष्म निरीक्षण आप करते हैं, आदरणीय अरुण भाईजी, वह मुग्ध कर देता है.

इस बार इनके माध्यम से आपने सूक्ष्म दर्शन के उन विन्दुओं को उठाया है जो कारण एवं कार्य तथा माया एवं सत्यात्य की व्याख्या करते हैं.  तदनुरूप, प्रस्तुत गीत के चारों बन्द उच्च कोटि की भावदशा को अभिव्यक्त कर रहे हैं, आदरणीय.

इस गीत के लिए हृदय से बधाई स्वीकारें..

शुभ-शुभ

Comment by Abhinav Arun on October 19, 2013 at 6:23pm

शब्द साहित्य और सीख का अद्भुत संगम ..अप्रतिम सुन्दर रचना ..हार्दिक बधाई आदरणीय श्री अरुण जी !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 19, 2013 at 6:23pm

आदरणीय अरुण निगम भाई , बहुत सुन्दर गीत की रचना की है आपने !!!! सुन्दर शब्द संयोजन , सुन्दर प्रवाह और भाव !!! आपको कोट्शः बधाई !!!!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 19, 2013 at 5:24pm

आदरणीय निगम साहब, बहुत ही सुन्दर नवगीत लिखा है, शब्द दर शब्द रचना की खूबसूरती देखते ही बनती है, बहुत बहुत बधाई । 

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