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ग़ज़ल; निलेश 'नूर' -झटक के ज़ुल्फ़

1212 1122 1212 22 

 

झटक के ज़ुल्फ़ किसी ने जो ली है अंगडाई,
ये कायनात लगे है हमें कुछ अलसाई.
**

किसी से प्यार न पाया सभी ने ठुकराया,
मिली यहाँ है मुहब्बत में सिर्फ रुसवाई.
**

किये थे रब्त सभी आपने कत’आ मुझसे,
जो कामयाब हुआ तब बढ़ी शनासाई. 
**

बता रहे थे मुझे, एक दिन, सभी पागल,
हुए सभी वो यहाँ लोग, आज सौदाई.
**

मुहब्बतों के सफ़र से ही लौट कर हमनें,
न करिए इश्क़ कभी, बात सबको समझाई.
**

यहाँ सभी है लगे जिसको आज़मानें में,
अभी सिखा के गया ‘नूर’ वो मसीहाई.   

******************************************
मौलिक एवं अप्रकाशित 
निलेश 'नूर'

Views: 630

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 21, 2013 at 8:08am

लेकिन ये जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल के शेर जैसा हो जाएगा ...
.
किसी को प्यार मिले और किसी को रुसवाई 
मुहब्बतों के सफ़र भी अजीब होतें है ...
ये पीने वालें बहुत ही अजीब होतें है .......
ऊपर से बहर भी यही है :(  कुछ और सोचता हूँ 


Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 21, 2013 at 7:28am

आदरणीय वीनस केसरी  जी, ग़ज़ल के शेर आप की ज़बान पर चढ़ने लगे, आपकी इस टिप्पणी से मेरे हौसले बढ़ने लगे ..बहुत बहुत धन्यवाद .. आप की सलाह आज्ञा तुल्य है. विचार करते करते कुछ मुझ से भी बन पड़ा है वो आप की नज्र करता हूँ ...आप की इजाज़त होगी तो तरमीम करूँगा ..पेश है ..
.
किसी से प्यार न पाया सभी ने ठुकराया, 
मुहब्बतों के सफ़र में मिली है रुसवाई.  

Comment by वीनस केसरी on October 21, 2013 at 1:04am

एक और कामयाब ग़ज़ल के लिए ढेरो दाद हर शेर ज़बान पर चढ जा रहा है

बहुत खूब

इसे ऐसा कर दें तो किस रहेगा !!!

किसी से प्यार न पाया हर एक ने ठुकराया,
मिली सभी से मुहब्बत में सिर्फ रुसवाई.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 19, 2013 at 2:44pm

धन्यवाद बृजेश जी, चन्द्र शेखर जी, नीरज जी ...
आभार

 

Comment by Neeraj Neer on October 19, 2013 at 8:50am

मुहब्बतों के सफ़र से ही लौट कर हमनें,
न करिए इश्क़ कभी, बात सबको समझाई.

बहुत खूब ..

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on October 19, 2013 at 1:32am
वाहहहहह
Comment by बृजेश नीरज on October 18, 2013 at 11:06pm

अच्छी ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 18, 2013 at 9:52pm

आदरणीय गिरिराज जी, रामनाथ जी, गणेश जी ... आप को ग़ज़ल पसंद आई तो लिखना सार्थक हुआ. धन्यवाद
आभार

   


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 18, 2013 at 9:12pm

//किसी से प्यार न पाया सभी ने ठुकराया, 
मिली यहाँ है मुहब्बत में सिर्फ रुसवाई.//
वाह वाह, क्या कहने, बढ़िया शेर हुआ है, इस ग़ज़ल की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 18, 2013 at 6:53pm

क्या कहने....नूर साहब.........मजा आ गया....शानदार ग़ज़ल...!!!..

इस शे'र के लिए जिंदाबाद...........!!!!!!............

.मुहब्बतों के सफ़र से ही लौट कर हमनें,
न करिए इश्क़ कभी, बात सबको समझाई.

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