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प्रेम-प्रेम की रट लगी, मर्म न जाने कोय!

देह-पिपासा जब जगी, गए देह में खोय!

 

मीरा का भी प्रेम था, गिरधर में मन-प्राण!

राधा भी थी खो गयी, सुन मुरली की तान!!

 

राम चले वनवास को, सीता भी थीं साथ!

बेर चखे थे राम ने, ले शबरी के हाथ!!

 

मन का मन से मेल है, मन का मन से संग!

नेह-डोर पर मन सधा, बिसरा सब तन-अंग!!

 

देह मोह का बंध है, यह माया का जाल!

देह-नशा जब सिर चढ़ा, तब आसा का हाल!!

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on October 6, 2013 at 8:39pm

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार! आपका आशीष पाकर रचना कृतार्थ हुई!

Comment by वेदिका on October 6, 2013 at 2:06pm

उन्नत दोहवली प्रस्तुति करण!

वास्तविकता के हर पहलू पर दोहा लेखन पर बधाई स्वीकारें आ0 बृजेश भाई जी!

Comment by बृजेश नीरज on October 4, 2013 at 9:08am

आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार! आपके शब्दों से दोहों पर प्रयास करने की हिम्मत बंधी. आगे और बेहतर कर सकूं, ऐसा प्रयास रहेगा!

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 1:52pm

भाईजी, बहुत शुद्ध और सतर्क दोहे हुए हैं. हृदय से बधाई स्वीकारें.
दूसरे, तीसरे और चौथे दोहे ने तो भाव मुग्ध कर दिया है. शुद्ध, समर्थ अकाट्य दोहे हुए हैं ये !

पहले और आखिरी दोहों को तनिक और विस्तार देना उचित लगा --  

प्रेम-प्रेम की रट लगी, मर्म न जाने कोय!
देह-पिपासा भर समझ, गए देह में खोय!

देह मोह का बंध है, यह माया का जाल !
देह-नशा जब सिर चढ़ा, बेतुक करे सवाल !!

शुभेच्छाएँ.

Comment by बृजेश नीरज on October 2, 2013 at 6:43am

आदरणीय निकोर साहब आपका हार्दिक आभार!

Comment by vijay nikore on October 2, 2013 at 5:14am

प्रेम के दोहे सुन्दर बने हैं, बधाई।

Comment by बृजेश नीरज on October 1, 2013 at 10:37pm

आदरणीया महिमा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by MAHIMA SHREE on October 1, 2013 at 10:35pm

बेहद उन्नत भाव से पगी सुंदर .... ..दोहावली के लिए बहुत-२ हार्दिक बधाई आदरणीय ब्रिजेश जी

Comment by बृजेश नीरज on October 1, 2013 at 10:35pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 1, 2013 at 10:22pm

अति सुंदर दोहावली, बधाई स्वीकारे आदरणीय बृजेश जी

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