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सपने !!!!!!!

सुहाने से

सँजोये थे जो मन के

भीतर आवरणो की परतों मे

सँजोया और सींचा था

नव पल्लव देख

मन झूम उठा था

खुशी के अंकुर भी

फूट पड़े थे

उड़ान की आकांक्षा मे

पंखों को कुछ फड़फड़ा कर

ज्यों हुआ उड़ने को आतुर !!!!

आह !!

पंख कतर दिये किसने ?

धराशायी हुआ

स्वर भी बाधित हुआ

जख्म लगे

अभिलाषी मन

परित्यक्त सा

कुलबुला उठा

अश्रुओं ने साथ छोड़ा

धैर्य ने भी  हाथ छोड़ा

वो अकुलाहट !!!!

बरस उठी बरबस

कुछ शांत हुआ अब जाकर मन

सपने !!!!!

कुछ भी न थे शेष

न अभिलाषा थी

दुबारा फिर सँजोने की

श्रेयस्कर था त्यागना ही

पुनः जीवन धारा मे लौट कर

अविरल बहना

पथ पर आगे बढ़ना

सदा ही निरंतर ।.............................. 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

 

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Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 12:38am

आदरणीय विजय मिश्र जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 12:37am

आदरणीय निकोर जी आपका हरदिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 12:36am

आदरणीया महिमा जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by विजय मिश्र on September 30, 2013 at 11:36am
जीवन का संचार तो निरंतर के प्रवाह में ही है ,नीत नूतन हो और अतीत के आवरणों से मुक्त स्वच्छ सरिता के जल की तरह .मनोदशा का सजीव चित्रण .साधुवाद अन्नपूर्णाजी .
Comment by vijay nikore on September 30, 2013 at 4:48am

सुकोमल भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति।

हार्दिक बधाई, आदरणीया अनुपमा जी

 

सादर,

विजय निकोर

 

Comment by MAHIMA SHREE on September 28, 2013 at 11:27pm

बहुत ही सुंदर .मर्म स्पर्शी  अभिव्यक्ति आदरणीया ...बधाई स्वीकार करें

Comment by annapurna bajpai on September 27, 2013 at 9:40pm

आदरणीय वैद्य नाथ जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by annapurna bajpai on September 27, 2013 at 9:40pm

आदरणीय भण्डारी जी आपका आभार । 

Comment by annapurna bajpai on September 27, 2013 at 9:39pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार अपना प्रेम यूं ही देती रहिए । 

Comment by annapurna bajpai on September 27, 2013 at 9:38pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी आपका हार्दिक आभार आपको रचना पसंद आई । 

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