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सावन संग होड़ ( कुण्डलिया )

कुण्डलिया 

सावन संग आज लगी, सखी नैन की होड़|

मान हार कौन अपनी, देत बरसना छोड़||

देत बरसना छोड़, नैन परनार बहे हैं |

कंचुकि पट भी भीज , विरह की गाथ कहे हैं ||

पड़े विरह की धूप, जले है विरहन का मन|

हिय से उठे उसाँस, बरसे नैन से सावन ||

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Saurabh Pandey on September 28, 2013 at 12:12am

आदरणीया शालिनीजी,

अभी कुछ दिनों पूर्व कुण्डलिया छंद पर आदरणीया सरिताजी से जो कुछ कहा, चाहूँगा, उसे आप भी पढ़ लें. लिंक दे रहा हूं --

http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:437713

आदरणीय रविकर जी की सुझायी गयी कुण्डलिया से उपरोक्त आशय का मिलान कर देखें..

सादर

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 5:16pm

बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया छंद आदरणीया  //हार्दिक  बधाई आपको //सादर

Comment by shalini rastogi on September 24, 2013 at 11:14pm

अरुन शर्मा 'अनन्त' जी आपकी शुभेच्छा के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Comment by shalini rastogi on September 24, 2013 at 11:13pm

आदरणीय सर रविकर  जी .. कुंडलिया रचाने में तो आप बेजोड हैं .. आपके द्वारा बताया गया परिवर्तन बहुत मोहक लगा .. आगे से गेयता का ध्यान रखने का प्रयास करुँगी |

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 24, 2013 at 11:07pm

आदरणीया शालिनी जी बेहद सुन्दर कुण्डलिया छंद इस हेतु ढेरों बधाइयाँ स्वीकारें बाकी रविकर सर एवं आदरणीय बागी भ्राताश्री जी ने सब कुछ कह ही दिया है.

Comment by shalini rastogi on September 24, 2013 at 10:16pm

annapurna bajpai जी एवं SANDEEP KUMAR PATEL जी .. आप दोनों का बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ!

Comment by shalini rastogi on September 24, 2013 at 10:13pm

Er. Ganesh Jee "Bagi" आदरणीय सर, आपके सुझावों पर अमल करने का प्रयास करुँगी |

सधन्यवाद

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 24, 2013 at 4:35pm

आदरणीय बहुत ही सुन्दर रचना
आदरणीय रविकर सर का सुझाव उत्तम लगा
जय हो

Comment by annapurna bajpai on September 24, 2013 at 4:09pm

वाह !!! आ0 शलिनी जी बहुत ही सुंदर कुण्डलिया , बहुत बधाई आपको ।

Comment by रविकर on September 24, 2013 at 9:15am

आदरेया -
उत्कृष्ट भाव
शुभकामनायें-
गेयता बाधित है-
कृपया कुछ इस प्रकार का परिवर्तन करके देखें-
सादर-


सावन से लग ही गई, सखि-नैनों की होड़|
हार मानते वे नहीं, दोनों ही बेजोड़ ||
दोनों ही बेजोड़ , नैन परनार बहाए |
कंचुकि पट भी भीज , विरह की गाथा गाये |
पड़े विरह की धूप, जले है विरहन का मन|
हिय से उठे उसाँस, नैन से बरसे सावन ||

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