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चाँद हौले से मुस्का दिया - कविता

अंधकार गहरा चला अब  

सितारों से भर चला नभ  

चाँद हौले से मुस्का दिया

अप्रतिम अलौकिक सुंदरता ...................

 

सुंदरी की खुली अलकें सी

चाँदनी भी छिटकने लगी

कण कण दुग्ध मे नहाया सा

प्रफुल्लित हो चला मन

लगता था जो पराया सा ........................

 

तप्त धरा सी वो

पाई जिसने शीतलता  

नीरवता तोड़ता विहग

आवरण जो असत्य का ,

अंधकार वो अहम का

हौले हौले .......................

चेतना लौटी प्रबुद्धता आई

नैसर्गिक अविचलता लाई

प्रेम और विश्वास का

स्नेह और उल्लास का

सागर लेने लगा हिलोरें....................................

अप्रकाशित एवं मौलिक  

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Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:12pm

आदरणीय कुशवाहा जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 26, 2013 at 3:51pm

चेतना लौटी प्रबुद्धता आई

नैसर्गिक अविचलता लाई

प्रेम और विश्वास का

स्नेह और उल्लास का

सागर लेने लगा हिलोरें

बहुत खूब 

सादर बधाई 

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:41pm

आदरणीय बागी जी आपकी टिप्पणी ने उत्साह वर्धन किया है । आपका धन्यवाद ।

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:40pm

आदरणीय आशीष जी आपका धन्यवाद ।

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:38pm

आदरणीय रविकर जी आपका आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:37pm

आदरणीय अमन  कुमार जी आपका धन्यवाद ।

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:36pm

आदरणीय भण्डारी जी आपका हार्दिक आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:35pm

adarniya Meena ji apko haidik dhanyvad .

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:35pm

adarniy Brijesh ji apka hardik abhar .

Comment by annapurna bajpai on September 6, 2013 at 12:32pm
आदरणीया महिमा जी आपका हार्दिक आभार ।

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