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ग़ज़ल : कोई चले न जोर तो जूता निकालिये

बह्र : मफऊलु फायलातु मफाईलु फायलुन (221 2121 1221 212)

---------

चंदा स्वयं हो चोर तो जूता निकालिये

सूरज करे न भोर तो जूता निकालिये

 

वेतन है ठीक  साब का भत्ते भी ठीक हैं

फिर भी हों घूसखोर तो जूता निकालिये

 

देने में ढील कोई बुराई नहीं मगर

कर काटती हो डोर तो जूता निकालिये 

 

जिनको चुना है आपने करने के लिए काम

करते हों सिर्फ़ शोर तो जूता निकालिये

 

हड़ताल, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जूलूस तक

कोई चले न जोर तो जूता निकालिये

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Sarita Bhatia on August 23, 2013 at 5:37pm

क्या बात है आदरणीय आज के मुताबिक सटीक शेर ,बधाई 

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 23, 2013 at 4:24pm

बहुत बढियां गज़ल, आदरणीय धर्मेन्द्र जी ! खासकर, 'जूता निकालिए' इस रदीफ के लिए तो क्या कहने ! ढेरों दाद कबूलें.....!

Comment by Shyam Narain Verma on August 23, 2013 at 3:33pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!
Comment by Vinita Shukla on August 23, 2013 at 1:24pm

बहुत खूब...गंभीर बातों की, रोचक अभिव्यक्ति. बधाई स्वीकारें.

Comment by Lata tejeswar on August 23, 2013 at 12:18pm

वेतन है ठीक  साब का भत्ते भी ठीक हैं

फिर भी हों घूसखोर तो जूता निकालिये

  bahut achha ...

Comment by नादिर ख़ान on August 23, 2013 at 11:04am

वर्तमान परिपेक्ष  में सटीक गज़ल, एक से बढ़कर एक शेर

बहुत खूब आदरणीय आदरणीय धर्मेंद्र जी ...

Comment by Abhinav Arun on August 23, 2013 at 5:33am

 क्या कहने आदरणीय ...सही है अब बातों से बात बनती नहीं दिख रही है ....ये तेवर अपनाना ही पड़ेगा ...सौ सौ साधुवाद इस मारक ग़ज़ल पर ..जन गन मन को स्वर दिया है कमाल कमाल !!

Comment by वेदिका on August 23, 2013 at 1:51am

चंदा स्वयं हो चोर तो जूता निकालिये

सूरज करे न भोर तो जूता निकालिये ...वाह क्या शानदार मतला है!!

बहुत शानदार और जोश भरी गजल कही आपने आदरणीय धर्मेन्द्र जी! बधाई !!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 23, 2013 at 1:41am

वेतन है ठीक  साब का भत्ते भी ठीक हैं

फिर भी हों घूसखोर तो जूता निकालिये...........वाह! बहुत खूब, रिश्वतखोर नुमाइन्दो के लिए सटीक शेर

जिनको चुना है आपने करने के लिए काम

करते हों सिर्फ़ शोर तो जूता निकालिये...........यह भी खूब कहा, देश के नेताओ के लिए

वाह! आदरणीय धर्मेन्द्र जी वाह... बेईमान घूसखोरो पर बहुत सुंदर गजल प्रस्तुत की, हार्दिक बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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