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ग़ज़ल : - याद तेरी में

ग़ज़ल : - याद तेरी में

याद तेरी में गुनगुनाता हूँ

ज़िंदगी को करीब पाता हूँ |

 

शीत कहती मुझे तू छू कर देख

और मैं दूब सा शरमाता हूँ |

 

तुझपे फबते हैं सोलहों श्रृंगार

मैं ही शीशा हूँ बिखर जाता हूँ |

 

तेरे पहलू में टंका एक गोटा

बदन को छू कर सिहर जाता हूँ |

 

भांप न ले की चाहता हूँ तुझे

इसी संकोच में घबराता हूँ |

 

रोज लिखता हूँ पातियाँ दस बीस

और फिर तुझसे मैं छुपाता हूँ |

 

इश्क पाकीज़ा रूहानी एहसास

दफअतन डूबता उतराता हूँ |

 

जितना धोता हूँ ये दुनियाबी लिबास

दाग़ दो चार और पाता हूँ |

 

नूर तेरा अव्वल उपाया है

नासमझ हूँ मैं भूल जाता हूँ |

 

(निर्गुण ख़याल की ग़ज़ल )

 

 

 

 

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on December 20, 2010 at 2:16pm

आभार  बागी  भाई   !!!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 19, 2010 at 11:36am

इश्क पाकीज़ा रूहानी एहसास

दफअतन डूबता उतराता हूँ |

बेहतरीन शे'र अरुण भाई ...........

 

जितना धोता हूँ ये दुनियाबी लिबास

दाग़ दो चार और पाता हूँ |

सूफियाना लहजे मे कही गई बात बहुत ही खुबसूरत है .........बधाई अरुण भाई ...

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