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दिया द्वार पर जूझ रहा

कितने कितने सूरज चमके

पर अँधियारा शेष रहा

तेरे मेरे मन के अंदर

इक संशय फल फूल रहा।।

 

सरपत के ढेरों झाड़ उगे

तन छू ले कट जाता है

इन बबूल के काँटों से भी

भीतर तक छिल जाता है

सावन की बौछारों में भी

मन उपवन सब सून रहा।।

 

तुम मिलते हो मुझको जैसे

इक गुजरी तरुणाई सी

भाव खिलें डाली पर कैसे

वह रूखी मुरझाई सी

साज संवार व्यर्थ रहा सब

धूल भरा यह रूप रहा।।

 

चिड़ियों ने भी पंख समेटे

हवा हुई अनजानी सी

नदिया की लहरें व्याकुल हैं

मछली कुछ अकुलानी सी

तूफानों के इस मौसम में

दिया द्वार पर जूझ रहा।।

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 7:02pm

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार! 

Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 7:01pm

आदरणीय लाडलीवाल जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by वेदिका on August 5, 2013 at 6:57pm

बहुत ही सुंदर नवगीत हुआ 

कसावट और लय के क्या कहने ....वाह 

बहुत बहुत बधाई लीजिये आदरणीय बृजेश जी !!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 5, 2013 at 3:33pm

सुन्दर भाव रचना के लिए हार्दिक बधाई भाई श्री बृजेश नीरज जी 

Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 2:30pm

आदरणीय बसंत जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 2:29pm

आदरणीय अरुन भाई मैंने मान लिया!

Comment by बसंत नेमा on August 5, 2013 at 2:21pm

बहुत सुन्दर रचना ..बधाई श्री बृजेश जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 5, 2013 at 2:21pm

आदरणीय बृजेश भाई जी ऐसा कतई नहीं है, यह सत्य है यकीन करें.

Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 2:17pm

आदरणीय अरुन भाई आपका हार्दिक आभार!
आपने मेरी टिप्पणी का बदला चुका दिया! :)))))))))))))

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 5, 2013 at 2:12pm

वाह आदरणीय बृजेश भाई जी वाह भाव, शिल्प, कथ्य एवं शब्द संयोजन मन मोह गया, आपको जब भी पढ़ता हूँ सोचता हूँ इतना सुन्दर मैं कब लिखूंगा मेरी रचनाओं में ऐसे भाव कब उत्पन्न होंगे. बृजेश भाई जी कुछ अधिक कहने के लिए शब्द नहीं हैं हृदयतल से ढेरों बधाई स्वीकारें.

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