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ग़ज़ल : कहानी तुम अमर कर दो

बहर : हज़ज मुरब्बा सालिम
१२२२, १२२२

दिवाना दिल जिगर कर दो,
इधर भी तो नज़र कर दो,

फलक से चाँद लाऊं मैं,
इशारा तुम अगर कर दो,

अकेले रास्ता मुश्किल,
सुहाना तुम सफ़र कर दो,

हजारों मैं ग़ज़ल कह दूँ,
सरल थोड़ी बहर कर दो,

पिला दो हाँथ से अपने,
सुधा बेशक जहर कर दो,

मुहब्बत मैं अजय कर दूँ,
कहानी तुम अमर कर दो...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 3:07pm

मतला तो यूँ-यूँ सा लगा मग़र आगे अशार जमते गये हैं. 

बधाई स्वीकारें

Comment by vijay nikore on August 7, 2013 at 10:33am

आदरणीय अरुन जी:

 

इस खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on August 5, 2013 at 9:56pm

फलक से चाँद लाऊं मैं,
इशारा तुम अगर कर दो |  


भई क्या कहने ! वाह वाह अरुण भाई !
बढ़िया गजल !

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 9:10pm

फलक से चाँद लाऊं मैं,
इशारा तुम अगर कर दो,' सुंदर जज्बातों का, खूबसूरत इज़हार. बधाई.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 5, 2013 at 8:44pm

अरुण जी 

पिला दो हाँथ से अपने
सुधा बेशक जहर कर दो,....क्या दीवानगी है .मुहब्बत के इस जज्वे को सलाम ..बहुत खूह 

Comment by Vasundhara pandey on August 5, 2013 at 7:21pm
वाह ,बहुत सुन्दर गजल अरुण !
Comment by Meena Pathak on August 5, 2013 at 1:50pm

बहुत सुन्दर गज़ल .. हार्दिक बधाई स्वीकारें 

Comment by Ketan Parmar on August 5, 2013 at 12:46pm

आदरणीय अरुण  जी ,सुन्दर गजल के लिए  बहुत बहुत बधाई...शुभकामनाये

Comment by बसंत नेमा on August 5, 2013 at 10:59am

आदरणीय अरुण  जी ,सुन्दर गजल के लिए  बहुत बहुत बधाई...शुभकामनाये 

Comment by Abhinav Arun on August 5, 2013 at 5:50am

हजारों मैं ग़ज़ल कह दूँ,
सरल थोड़ी बहर कर दो,

पिला दो हाँथ से अपने,
सुधा बेशक जहर कर दो,

मुहब्बत मैं अजय कर दूँ,
कहानी तुम अमर कर दो...

लाजवाब अशआर है आदरणीय वाह वाह बहुत खूब , हार्दिक बधाई आपको श्री अरुण जी  !!

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