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बेजान कमरे में
टूटी खटिया पे लेटा
करवट लेते हुए
आँखों के पूरे सूनेपन के साथ
कभी कभी खिड़की के
बाहर देखता हूँ
कैसी है दुनियां
क्या वैसी ही है
जैसी पहले हुआ करती थी
दर्द के समंदर में
निस्पंद जड़ सा
सोचता रहा
अपने ही अपने नहीं रहे
ये गुमशुदी का जीवन कब तक
एक चिंता जाती
तो दूसरी उत्पन्न
देखता रहता हूँ
सजीव कंकाल सा
इधर उधर
बस जिंदा हूँ
औपचारिक

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक /अप्रकाशित 

Views: 651

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on August 4, 2013 at 2:10pm

हार्दिक आभार आदरणीया महिमा जी //सादर 

Comment by MAHIMA SHREE on August 4, 2013 at 2:06pm

धीर गंभीर चितंन मनन के क्षणों का सुंदर प्रस्तुति आ. राम शिरोमणि जी बधाई

Comment by ram shiromani pathak on August 4, 2013 at 1:48pm

हार्दिक आभार आदरणीय आशुतोष मिश्र  जी //सादर 

Comment by ram shiromani pathak on August 4, 2013 at 1:47pm

हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी //सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2013 at 10:51pm

अकेले होने के क्रम में यह भी एक 'मज़ेदार' फेज है, भाई.. .

बढ़िया.. .

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 31, 2013 at 4:47pm

hardik badhayee sweekarein 

Comment by ram shiromani pathak on July 30, 2013 at 10:20pm

hardik aabhar bhai arun sharma anant ji//saadar

Comment by ram shiromani pathak on July 30, 2013 at 10:15pm

hardik aabbhar bhai brijesh singh jj//saadar

Comment by बृजेश नीरज on July 30, 2013 at 6:44pm

आदरणीय राम भाई, लाजवाब! बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई!

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 30, 2013 at 3:55pm

बेहतरीन भाई बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति वाह क्या कहने हार्दिक बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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