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कुछ शहनशाहों के तख़्त

कुछ ऊँचे पर्वतों के शिखर

कुछ ऊँचें अटार

कुछ ऊँचें लोग अपने कद से भी बहुत ऊँचे

आम आदमी पहुँच नहीं पाता उन तक

और सिर झुकाए निराश है

पर देखो

लाख किरकिराती है

किसी को फूटी आँख नहीं सुहाती है  

फिर भी धूल बही जाती है बेफिक्री में

बिना दुःख और मलाल के

और होता भी है यह है कि

आदी कैसी भी हो

अंत उसके सुपुर्द होता है  .... ~nutan~

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by rajesh kumari on July 9, 2013 at 9:31pm

बहुत अच्छी रचना गहन भाव सबको अंत के सुपर्द होना है फिर किस बात का गर्व किस बात का अहम् बधाई प्रिय नूतन जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on July 9, 2013 at 6:30pm

बहुत सुंदर एवं पुष्‍ट रचना है, सादर

कृपया ध्यान दे...

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