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चाँद उदास था ....


कल चाँद बहुत उदास था 
तारे भी थे बुझे बुझे
हवा भी थी रुकी रुकी 
रात के दामन में,
छुपा सा कोई राज था 
कल चाँद बहुत उदास था ......
*******
पूछा तो कुछ बोला नहीं 
भेद कुछ खोला नहीं 
हंसी में उसकी दर्द था 
आँखों में थी नमी बसी 
दिल से दूर था कही 
कहने को मेरे पास था 
कल चाँद बहुत उदास था ....
*******

 

रंगत जरा फीकी सी थी 
नींदे  कही उडी सी थी 
सपने खड़े थे देहलीज पे 
आंखे मगर खुली सी थी 
धडकन भी थी खामोश सी 
बस कहने बार को श्वास था 
कल चाँद बहुत उदास था ....
*******

 

डूबा हुआ था याद में '
टूटे किसी इक खवाब में 
कोशिश तो थी संभलने की 
पर दर्द था आवाज में 
हवाओ की सरसराहट में 
बस दर्द भरा राग था 
कल चाँद बहुत उदास था ....
*******

 

खिडकी पे बैठे रही 
बस उसे तकती रही 
चाहा की उससे पूछ लू 
एक राज तो बता दे तू 
क्यों बेदाग़ सी थी रौशनी 
क्यों चाँद दागदार था 
कल चाँद बहुत उदास था ....
*******

 

(रौशनी धीर )

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 14, 2013 at 10:12pm

आ0 रोशनी जी, ‘पूछा तो कुछ बोला नहीं
भेद कुछ खोला नहीं
हंसी में उसकी दर्द था
आँखों में थी नमी बसी
दिल से दूर था कही
कहने को मेरे पास था
कल चाँद बहुत उदास था..।‘ मैं होता तो यूं कहता.. चांदनी के पाश में फिर न जाने कैसे बंध गयी। अतिसुन्दर गीत हेतु तहेदिल से हार्दिक बधाई स्वीकारें, सादर,

Comment by vijay nikore on May 14, 2013 at 5:52pm

आदरणीया रौशनी जी:

 

भाव भीनी मार्मिक रचना के लिए बहुत बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by ram shiromani pathak on May 14, 2013 at 3:56pm

बहुत खूब बधाई इस सुन्दर रचना के लिए/////

Comment by Shyam Narain Verma on May 14, 2013 at 3:29pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 14, 2013 at 1:33pm
एक राज तो बता दे तू 
क्यों बेदाग़ सी थी रौशनी 
क्यों चाँद दागदार था 
कल चाँद बहुत उदास था
बहुत खूब 
सस्नेह बधाई 
Comment by coontee mukerji on May 14, 2013 at 12:33pm
पूछा तो कुछ बोला नहीं 
भेद कुछ खोला नहीं 
हंसी में उसकी दर्द था 
आँखों में थी नमी बसी 
दिल से दूर था कही 
कहने को मेरे पास था 
कल चाँद बहुत उदास था .........बहुत सुंदर .......जब मन उदास होता है तो कवि सारी प्रकृति में उदासी की छवि देखता है .......यह रचना स्वांत दुखाय से बहुजन सुखाय  की एक सफ़ल कृति है .ऐसी स्तिथि हर संवेदंशील इंसान के जीवन कभी न कभी ज़रूर आता है ./ सादर / कुंती .

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