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दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं

तमाम विसंगतियों के विरोध में एक ताज़ा ग़ज़ल .....


दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं 
फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं 

किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं

आरियाँ खुश थीं कि बस दो –चार दिन की बात है 
सूखते पीपल पे फिर से पत्तियाँ आने लगीं

 

उम्र फिर गुज़रेगी शायद राम की वनवास में

दासियों के फेर में फिर रानियाँ आने लगीं

 

बीच दरिया में न जाने सानिहा क्या हो गया

साहिलों पर खुदकुशी को मछलियाँ आने लगीं

 

है हवस का दौर यह, इंसानियत है शर्मसार

आज हैवानों की ज़द में बच्चियाँ आने लगीं

 

यूँ शहादत पर सियासत का नया फैशन दिखा

शोक जतलाने को नीली बत्तियाँ आने लगीं

 

हमने सच को सच कहा था, और फिर ये भी हुआ

बौखला कर कुछ लबों पर गालियाँ आने लगीं

 

शाहज़ादों को स्वयंवर जीतने की क्या गरज़

जब अँधेरे मुंह महल में दासियाँ आने लगीं

 

आज कह के कल मुकर जाने को सब तय्यार हैं

शाइरों में भी सियासी खूबियाँ आने लगीं

 

उसने अपने ख़्वाब के किस्से सुनाये थे हमें

और हमारे ख़्वाब में भी तितलियाँ आने लगीं  



- वीनस केसरी 
मौलिक व अप्रकाशित 

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 8, 2013 at 7:47pm

आ० वीनस जी, किस एक शेर की खास तारीफ़ करूँ... हर शेर बेहद उम्दा है

इस गज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 8, 2013 at 6:19pm

आरियाँ खुश थीं कि बस दो –चार दिन की बात है 
सूखते पीपल पे फिर से पत्तियाँ आने लगीं

 बहुत अच्छी लगी 

सस्नेह बधाई, वीनस जी 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 2:22pm

अभिनव अरुण जी,

यह आपकी मुहब्बत और ज़र्रा नवाजी है 
आप लोगों के आशीर्वाद और स्नेह ने ही कुछ कह सुन लेने के लायक बनाया है 

सादर 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 2:20pm

गणेश भाई जी,
प्रत्येक शेर पर टिप्पणी करके आपने मुझे अनुग्रहीत किया, आपका आभरी हूँ 

नीली बत्ती वाली बात आपने खूब पकड़ी, इसके साथ ही शेर खुद ख़ारिज हो गया

राम वाले शेर को जनर्लाइज करने का प्रयास करता हूँ 

सादर 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 2:12pm

अशोक रक्ताले साहब ग़ज़ल की लयात्मकता और भाव पर आपके भावों ने मुझे अनुग्रहीत किया 

सादर 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 2:10pm

मनोज जी ग़ज़ल को आपका स्नेह मुझे और बेहतर करने को प्रेरित करता रहेगा 
सादर 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 2:09pm

केवल प्रसाद जी,
आपका हार्दिक आभार 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 1:59pm

उषा तनेजा जी,
ग़ज़ल के भाव पक्ष को आपका अनुमोदन मेरे लिए संतुष्टि का पर्याय बन रहगा है  

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 1:57pm

कुंती जी,

जिस शेर को आपने पसंद किया है वही शेर इस ग़ज़ल की नींव है जिसे ४ महीने पहले कहा था और इसके बाद अब पूरी ग़ज़ल हो सकी है ...

सादर 

Comment by वीनस केसरी on May 8, 2013 at 1:45pm

शशि पुरवार जी

यह मेरी खुशकिस्मती है
आपका आभारी हूँ 
सादर 

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