For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

(1)
कब मैंने तुमसे
वादा किया था कोई
अपने को मैंने कब बंधन में बाँधा
जो किया , तुमने ही किया
हर सुबह आलस्य तजकर
पूजा की थाल सजा
अरूणोदय होता तेरे दर्शन से .

(2)
मिथ्या लगी
जग की सारी बातें
जब मैंने तुमसे प्रीत की
अब क्रोध करूँ या मान करूँ
या करूँ अपने आप पर दया
रीति रिवाजों के नाम पर
खींच दी तुमने सिंदूर की लम्बी रेखा
भाग्य ने लिख दी माथे पर मृत्युदण्ड
चेहरे पर घूँघट खींचकर .

(3)
मौत का कहीं नामोनिशान नहीं
खामोश है तक़दीर
एक अदृश्य भय मन को सालता
सुहाग बिंदी दर्पण से पूछती
‘’ कब तक है अस्तित्व मेरा ? ‘

(4)
कितने सवाल उठते हैं ,
मगर अधूरे ,
मन की आशाएँ उतनी ही चंचल ,
सागर में उठती जितनी लहरें
आकाश में जितने हैं उड़ते बादल .

(5)
सदियों से नारी पूछ रही
है सवाल !
कभी कन्या कभी भार्या बन कर
कहाँ है मेरे पग तले की जमीन ?
इतनी बड़ी धरती में
मैं क्यों अस्तित्वहीन ?

Views: 765

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by coontee mukerji on May 3, 2013 at 9:51pm

आप सभी को मेरा प्रणाम , जब से मैं ओ बी ओ से जुड़ी हूँ मैंने देखा है यह मंच सिर्फ़  काव्य प्रस्तुति नहीं , विविध विषयों के मंथन के साथ ही एक पारिवारिक मंच भी है जहाँ हम अपने मन के उद्गारों को उन्मुक्त हो कर व्यक्त कर सकते है . अच्छी प्रस्तुति पर जहाँ   पुरस्कार मिलते हैं .. वहीं गलती करने पर डंडे भी पड़ते हैं .... और मुझे डंडे से बहुत डर लगता है . डाक्टर  मुकर्जी एक रचना को सौ बार पढ़वाते है तब मेरी रचना को यह मंच नसीब होता है ...... कहते हैं अच्छा साहित्य पढ़ो .....मनन करो ....तब लेखनी में गुण पैदा होगी ..बाप रे कितनी सारी बंदिशें....... क्या होता अगर चाकलेट जैसा सबकुछ आसान होता ........

शुभेच्छु  /   कुंती .

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 3, 2013 at 12:08pm

कभी कन्या कभी भार्या बन कर
कहाँ है मेरे पग तले की जमीन ?
इतनी बड़ी धरती में
मैं क्यों अस्तित्वहीन ?

आदरणीय कुंती जी 

सादर 

सुन्दर भाव एवं प्रस्तुतिकरण हेतु बधाई. 

वास्तव में नारी की स्थिति में आज भी कोई परिवर्तन नही दिखता. 

Comment by कल्पना रामानी on May 3, 2013 at 9:19am

बहुत सुंदर भाव और उत्तम प्रस्तुतीकरण के लिए हार्दिक बधाई, कुंती जी...

Comment by manoj shukla on May 3, 2013 at 9:04am
आदर्णीया कुन्ती जी, हृदय को छू जाने वाली इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें...सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 3, 2013 at 6:57am

श्रद्धा के प्रश्न नहीं होते. यह प्रश्नहीन हुआ करती है. किन्तु आपसी समझ को मिली ठोस धरातल की अनायास ठेस वायव्य भावनाओं को झंझोर डाले तो परस्पर आश्रित होने का भाव मात्र हठ हो कर रह जाता है, जिसके अंतहीन प्रश्न हुआ करते हैं जो ’विश्वास’ पर आश्रित संबन्धों को रेशा-रेशा कर डालते हैं.

आपकी पाँचों भाव-दशा अद्भुत संप्रेषणीय है, आदरणीया कुन्ती जी.

मानवीय संबन्धों की टेक बहुत गूढ़ होती है. उसमें भी स्त्री-पुरुष के संबन्ध सदा से महीन तार से बन्धे होते हैं जिसका अस्तित्व परस्पर विश्वास से ही प्राण पाता है. उसमें घर कर गयी एकाकी व्यथा उद्विग्न कर डालती है. एक व्यथित एवं संवेदनशील स्त्री की दशा शब्द पा गयी है.

सादर

Comment by vijay nikore on May 2, 2013 at 9:01pm

आदरणीया कुंती जी।

सदैव की तरह भावपूर्ण,विशिष्ट विचारों से पूरित अति उत्तम रचना ...

बहुत कुछ सोचने को बाधित कर रही है। आपको अनेकानेक बधाई।

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 2, 2013 at 8:21pm

आ0 कुन्ती जी,  सच्चाई के परिवेश में यह एक विडम्बना ही है।  मानव का सम्पूर्ण जीवन बस प्रश्नों से ही घिरा हुआ है।  इन प्रश्नो का उत्तर बस आस्था, विश्वास, श्रध्दा, धैर्य और एक लम्बी सी जुदाई, जो हरपल याद दिलाती है कि हमें निरन्तर प्रश्नों से दो-दो हाथ करना है।   बहुत ही सुन्दर, सार्थक और विचारगम्य रचना। बहुत बहुत हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Feb 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Feb 28

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service